सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

बेनामी और घूंघट

घूंघट(ब्लॉग) के पट खोल री तोहे पिया (बेनामी छद्मनामी) मिलेंगे . ये परंपरा शायद अपने देश ही की उपज है जिसे पश्चिम ने बाद में अपनाया . इस देश में यह इसलिये उपजी की विदेशियों का शासन लंबे समय तक रहा और राज कोप से बचने के लिए लोग इसका सहारा लेते रहे . छ्द्म नामो से लोगो ने बहुत लिखा कविता, कहानी, उपन्यास और लेख .

घूंघट की परंपरा भी इस्लाम के इस देश में आने से हुई . इन दोनों में एक समकालीनता है .
पहले के बेनामी और ब्लॉग जगत के बेनामी में मुख्य फर्क यह है की पहले ज्यादातर लोग सुरक्षात्मक कारणो से ऐसा करते थे अब अपनी भड़ास निकालने के लिए करते हैं .

इंटरनेट के आने से यह परंपरा और पुष्पित पल्लवित हुई क्योंकि लोग अपनी पहचान सबको नहीं बताना चाहते थे , विशेषकर महिलाएँ और कुछ शासकीय कर्मचारी  . ब्लॉग जगत के आने से इसका और विस्तार हो गया क्योंकि ईमेल से तब भी यह पता लग सकता था की आप कहाँ के हैं . ब्लॉग में आपकी इच्छा है, कितनी जानकारी आप अपने परिचय में डालते है . सिर्फ एक छद्म नाम दे सकते हैं.अपनी जगह एक फूल का चित्र लगा सकते हैं, चाहें तो अपना ईमेल आईडी और फोन नंबर इत्यादि दें या नहीं दें .अगर आप यह सब नहीं देते तो आप केवल एक तरफा संवाद करना चाहते हैं. अगर आप कोई एक भी लिंक देते हैं तो यह समझा जाता है कि इस माध्यम से आप सार्वजनिक  संपर्क के लिए उपलब्ध हैं .वैसे किसी ने तो "बेनामी" नाम से ब्लॉग भी बना लिया है

ब्लॉगर ने भी पूरी सुविधा दे रखी है इस सबके लिए . लेकिन फिर भी कुछ जानकार लोग सब पता लगा लेते हैं .आपका क्या ख्याल है इस बारे में .

5 टिप्‍पणियां:

डॉ टी एस दराल ने कहा…

उपरवाला सबको सद्बुद्धि दे।

हेमन्त कुमार ने कहा…

सही कहा आपने...।
आभार ।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत सही विश्लेषण किया आपने.

रामराम.

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपका विश्लेषण सही है .......... नेट और कमपूटर जानकार लोगों को पता लगाना मुश्किल नही है .....

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

अपनी अपनी पसन्द है डाक्टर साहब क्या कहे. पर हमसे पुछे तो हमे लगता है कि बेनामी रहने की जरूरत ही नही है. नाम मे क्या रखा है जो बेनामी रहो, कुछ भी नाम रख लो जब तक प्रत्यक्ष सम्पर्क के साधन उपयोग ना करो सामने वाला बेनामी ही होता है.