शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2009

मेरी देवभूमि यात्रा ५

प्रातःकाल  अभिषेक के बाद वापसी यात्रा प्रारंभ हुई . केदारनाथ से फाटा हेलीकॉप्टर से और उसके आगे सड़क मार्ग से . अगला पड़ाव बद्रीविशाल जी थे लेकिन रस्ते में रात्रि विश्राम के लिए कहीं रुकना होगा .
हरिद्वार से बद्रीनाथ की दूरी ३०२ किलोमीटर है .रुद्रप्रयाग  से बद्रीनाथ और केदारनाथ का रास्ता अलग होता है . रुद्रप्रयाग >गौचर > कर्णप्रयाग > नंदप्रयाग >चमोली >पीपलकोटी >जोशीमठ >विष्णुप्रयाग>गोबिंद घाट >पान्दुकेश्वर  >बद्रीनाथ.

नंदप्रयाग
शाम तक गोबिंद घाट पहुंचकर रात्रि विश्राम . यह वह स्थान है जहाँ से हेमकुंड साहिब के लिए पैदल पथ प्रारंभ होता है . यहीं से प्रसिद्ध फूलों की घटी का रास्ता भी जाता है . दोनों स्थानों के प्रवास के लिए ४-५ दिन लगते हैं . जोशीमठ वह स्थान है जहाँ शीतकाल में बद्री जी का निवास होता है . इस क्षेत्र में ५ की संख्या का काफी महत्व है . पांच प्रयाग हैं याने पांच जगह विभिन्न नदियों का संगम है . पांच केदार भी हैं पंचकेदार .

साथ साथ सड़क और नदी


हेमकुंड जाते जत्थों का विश्राम


दुर्गम राहें



पहाडी खेत में काम करती महिलाएं माँ परम्परागत पोशाक में तो बिटिया पैंट  शर्ट में. महिला से हुई बातचीत से पता चला यहाँ आलू , गोभी और बैगन की पैदावार  होती है. बच्चे सभी पढ़ रहे हैं और छुट्टी के दिन परिवार की मदद  खेतों में करते हैं .


                                                            फूलों की बिखरी छटा

क्रमशः:

बुधवार, 7 अक्टूबर 2009

मेरी देवभूमि यात्रा ४

गुप्तकाशी से फाटा नाम की जगह से हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध है केदारनाथ जी के लिए . यह जगह गुप्तकाशी से करीब १८ किलोमीटर दूर है . परम्परागत मार्ग गौरीकुंड से पदयात्रा या घोडे या पिट्ठू से की जा सकती है . पिट्ठू उस व्यक्ति को कहा जाता है जो मनुष्य या सामान को अपनी पीठ में ढोकर ले जाता है . गौरीकुंड से केदार जी की दूरी १४ किलोमीटर है.
हेलीकॉप्टर शासकीय पवन हंस और एक निजी सेवा की भी उपलब्ध है . आने जाने का एक व्यक्ति का किराया ७ हजार है . आप चाहें तो सुबह जाकर दो घन्टे बाद दर्शन करके वापस आ सकते हैं . अगर आपको विशेष पूजा में शामिल होना है तो रात्रि विश्राम कर दूसरे दिन वापसी कर सकते हैं . हमने रात्रि विश्राम का निश्चित किया . रात्रि में अच्छी ठण्ड थी .यहाँ मोटी दोहरी रजाइयों का उपयोग करना होता है . पानी सामान्यतः काफी ठंडा होता है . गर्म पानी की अलग से कीमत देनी होती है .

                                                                     हिमाच्छादित पर्वत श्रंखला




                    केदारनाथ जी 






                                                       हेलिपड से केदारनाथ जी का विहंगम दृश्य

क्रमशः:

सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

मेरी देवभूमि यात्रा ३

समीर जी मैंने चित्रों के संख्या बढा दी है . राज जी आपके अनुरोध पर भी ध्यान है . हरिद्वार से गंगोत्री की दूरी २६८ किलोमीटर है.  शासकीय गढ़वाल मंडल विकास निगम के अलावा निजी होटल और धर्मशालाएं भी राह में पड़ती हैं  .हरिद्वार >ऋषिकेश>नरेन्द्र नगर >चम्बा>चिन्याली सौर>धरासू>डुंडा>उत्तरकाशी>नेताला>भटवारी>गंगनानी>हरसिल>धरली>भैरों घाट>गंगोत्री .गंगोत्री की उचाई ३०४८ मीटर  है . नक्शे में ये भी दिया है कि एक घंटे में लगभग ३० किलोमीटर की दूरी तय की जा सकती है लेकिन इससे भी ज्यादा समय लग सकता है . रात के ८ बजे के बाद यात्रा करने पर निषेध है क्योंकि यह क्षेत्र पहाडी, घुमावदार और भूस्खलन वाला क्षेत्र है . बेहतर यही होता है सुबह जल्दी निकलें और सूर्यास्त पर यात्रा को विराम दें . उचाइयों को छोड़ दें तो बाकि जगहों में मौसम सुहावना रहता है रात को भी ज्यादा ठण्ड नहीं थी.

                                                          एक जल विद्युत सयंत्र का निर्गमन क्षेत्र


                                                                   एक सुरंग से बाहर आते हुए

अगली सुबह केदारनाथ के लिए यात्रा प्रारम्भ हुई.यहाँ देखें  प्राकृतिक कार धुलाई
केदारनाथ जी की दूरी हरिद्वार से २६९ किलोमीटर है . नक्शे में अगर देखा जाये तो यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ एक लाइन में दिखाई देते हैं लेकिन पहुँच  मार्ग के लिए ऊपर जाकर फिर कुछ नीचे आकर फिर ऊपर जाना होता है . हरिद्वार>ऋषिकेश>शिवपुरी>बयासी>कौदिअला >देवप्रयाग>श्रीनगर>कालिया सार >रुद्रप्रयाग>तिलवारा>अगस्त्यमुनि>कुन्द्द >गुप्तकाशी>फाटा  >सोनप्रयाग>गौरीकुंड  >रामबरा>केदारनाथ . रुद्रप्रयाग से केदारनाथ और बद्रीनाथ का रास्ता अलग होता है .हमारा आज का पडाव था गुप्तकाशी पहले हमने एक मोड़ लेते हुए त्रिजुगीनारायण मंदिर के लिए प्रस्थान किया . कहा जाता है कि शिव पार्वती का विवाह यहाँ हुआ था . यह एक पहाडी पर स्थित है लेकिन यहाँ भी पंडितों की भीड़ है .

काम पर जाती महिलाएं


वानर सेना
आगे बढ़ते हुए चोपटा होते हुए जिसे यहाँ का स्विट्जरलैंड कहा जाता है (शायद उचाई के कारण) हमारा आज का रास्ता केदारनाथ सुरक्षित प्राणी क्षेत्र से होकर गुजरता था .  कस्तूरी मृग के बचाव के लिए यह विशेष  क्षेत्र बनाया  गया है.

                                                                 टिहरी क्षेत्र में नया पुल

                                                                 गाँव का स्कूल


                                                                                कस्तूरी मृग
                  हमारी आज की यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी कस्तूरी मृग के उसके प्राकृतिक  निवास में दर्शन यह भी एक उपलब्धि थी कि उसका चित्र लेने में सफल होना . ड्राईवर भी अचंभित  हो गया था उसका कहना था आज तक उसने मृग को नहीं देखा था :).
आज की यात्रा के पडाव गुप्तकाशी में साध्य काल में पहुंचकर रात्रि विश्राम


                                                                सांझ का तारा

क्रमशः:

                                      

बुधवार, 30 सितंबर 2009

मेरी देवभूमि यात्रा 2


हरिद्वार रात्रि में पहुंचे . होटल में रात्रि विश्राम करके दूसरे दिन आगे की यात्रा प्रारंभ की . पहला प्रवास गंगोत्री की ओर था . यह यात्रा एक दिन में पूरी नहीं हो सकती थी सो रात्रि विश्राम नेताला में करने का फैसला किया . छोटी सी खूबसूरत जगह . रस्ते में टिहरी जहां थी वह स्थान भी देखने मिला, एक पूरा क़स्बा जलमग्न (ऊपर चित्र में)  .


इन्द्रधनुष सामान्यतः आसमान में दिखाई देता है लेकिन यह आँखों के सामने है . यहाँ पर एक पाइप से पानी ऊपर की ओर जा रहा था जिससे परावर्तित सूर्य की किरणे यह मनोरम दृश्य उत्पन्न कर रही थी .



अगले दिन गंगोत्री के लिए निकले रस्ते में एक स्थान पर भूस्खलन हुआ था जिसके कारण कुछ समय रुकना पड़ा . सीमा सड़क बल की तत्परता से रास्ता फिर से ठीक कर आवागमन के लिए खोल दिया गया




एक पुल से गुजरते हुए नीचे गहराई में बहती नदी . ड्राईवर के अनुसार एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा पुल . पुल काफी पुराना  भी है


दोपहर में गंगोत्री पहुंचे



गंगोत्री मंदिर

                                                          काम से लौटती महिलाएं

                                                                                             जलप्रपात


                                                               गूजर बाल चरवाहा

गंगोत्री में दर्शन और भोजन के बाद वापस नेताला की ओर निकले . रात्रि विश्राम नेताला में .

क्रमश :

मंगलवार, 29 सितंबर 2009

मेरी देवभूमि यात्रा

एक लम्बे अंतराल के बाद ब्लॉग जगत में उपस्थित  हूँ. इस बीच उत्तराखंड की यात्रा पर था . इसे सही रूप से देवभूमि नाम दिया गया है . वहाँ  जाकर इतनी शांति और सौम्यता का अनुभव होता है जो कि किसी अन्य स्थान में कम ही  होता है . भारत में मैंने काफी भ्रमण किया है, उत्त्तर पूर्व को छोड़कर. बिरले ही ऐसी जगह हैं जहाँ इतना अच्छा लगता है . पर्वतीय स्थलों में भी इसकी तुलना केवल मानसरोवर से की जा सकती है .
रायपुर से हरिद्वार तक रेल यात्रा और उसके बाद सड़क मार्ग से यह  यात्रा सम्पन्न हुई. छोटी मोटी रुकावटों को छोड़कर  

यात्रा सकुशल सम्पन्न हुइ. कुछ चित्र देखें :-        तकनीक की पहुँच 





                                                 केदारनाथ जी का शिखर रात्रि में 


क्रमशः :-

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

क्या है आपका पितृपक्ष

आज  मीनू खरे जी के ब्लॉग  पर नजर पड़ी.

सारे धर्म अपने बुजुर्गों का सम्मान करना सिखाते हैं . एक बात जो यहाँ सामने आ रही है उसपर मैं अपने विचार रखना चाहता हूँ .
हिन्दू धर्मं में मान्यता  है पुनर्जन्म की और यह अन्य धर्मों में भी है, कुछ दूसरी तरह से . इस्लाम में कहा जाता है कि एक दिन सब फिर उठ खड़े होंगे इसलिए शरीर को दफनाया जाता है . बौद्ध धर्मं ( Life after death) ने जितना काम किया है मृत्यु और उसके बाद पर  शायद ही किसी और धर्म ने किया है या जाहिर किया है . इसी सन्दर्भ में कहा जाता है कि जिस वंश कि मुक्ति होनी है उस वंश में लड़के का जन्म नहीं होगा . इसका कारण यह बताया  गया है कि पुत्र को परिवार का वाहक माना गया है . भ्रम यह है की जहाँ पुत्र नहीं होगा वहां वंश ख़त्म हो जायेगा जबकि  स्तिथि विपरीत है . यह एक मुक्ति का द्वार है . अब यह आप पर है आप कौनसा  मार्ग  अपनाना  चाहते हैं