बुधवार, 24 मार्च 2010

क्या पार्टी का विधान संविधान से बड़ा है - क्या यही प्रजातन्त्र है ?

हमारा देश संवैधानिक रूप से प्रजातन्त्र है जहाँ व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है , इसी अधिकार के अंतर्गत वह अपने प्रतिनिधि विभिन्न रूपों में चुनता है . यह स्थानीय संस्थाओं से लेकर सर्वोचः लोक सभा तक
लोगों को चुनने के लिए दिया गया है . अब दूसरी ओर राजनैतिक पार्टियाँ हैं जो इन्हे व्हिप के माध्यम से बंधक बना लेती हैं . तो आपका प्रतिनिधि और आपका अधिकार बंधक हो जाता है , ये कैसा प्रजातन्त्र है जहाँ एक अधिकार दूसरे गौण अधिकार के कारण विलोपित हो जाता है ?
राज्य सभा और अन्य उच्च सदनो का निर्माण जिस उद्देश्य से किया गया था उसका भी शायद अपहरण हो गया है.
इसका उद्देश्य था उन गुणवानों या समूहों को प्रतिनिधित्व्व देना जो संख्या में कम हैं और उनके अनुभवो का लाभ देश के विकास के लिया लेना . अब इसका उल्लंघन जब देश का प्रधानमंत्री भी कर रहा हो एक सुदूर प्रदेश से राज्य सभा सदस्य बनकर तो छत्तीसगढ़ से भी वही सदस्य बनेगा जिसे राजनैतिक पार्टियाँ चाहेंगी चाहे उसका इस राज्य से कोई संबंध हो या न हो .

6 टिप्‍पणियां:

S B Tamare ने कहा…

जनाब !
ये कोइ नया प्रसंग नहीं है भगवन ! इससे पहले भी भतेरी दफा वैधानिक अधिकारों का अपहरण मुल्क के आकाओं द्वारा किया जाता रहा है अब तो जनाब ये अपहरण भी वैधानिक सूरत अख्तियार कर चुका मान लिया गया है और वो भी मौन और अलिखित तौर पर !

Jandunia ने कहा…

यहां तो प्रतिनिधि थोपे जा रहे हैं जनता क्या करें ?

Jandunia ने कहा…

चलिए कन्याओं का महत्व तो पता चला। रामनवमी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

Jandunia ने कहा…

चलिए कन्याओं का महत्व तो पता चला। रामनवमी की ढेर सारी शुभकामनाएं।

राज भाटिय़ा ने कहा…

गुंडो के राज मै मियां आप केसी इमान दारी की बाते करते है जी??

Udan Tashtari ने कहा…

सब सुविधानुसार खेला सियासी खेल है.