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शनिवार, 22 अगस्त 2009

इंसान से अच्छे तो कुत्ते ही हैं शायद इसमें कोई विवाद नहीं होगा

मैं यहाँ क्षमा याचना करता हूँ स्वान श्रेणी से उनकी इंसान से तुलना करने के लिए .
लोगों ने क्या मुहावरा बन रखा है कुत्ते की मौत मरना. कभी कोई नहीं कहता इंसानों की मौत मरना . क्योंकि आजकल कोई भी स्वाभाविक मौत नहीं मरना चाहता या उसके रिश्तेदार नहीं मरने देते . मृत्यु और बीमारी भी अब एक status symbol बन गया है अगर आप बीमार हैं तो कहीं भरती हैं या अधोगति को प्राप्त हुए तो कहाँ से प्रस्थान हुआ ये आज यह अत्यावश्यक है नहीं तो आपका समाज में स्तर कम हो जायेगा .
कुत्ते की मौत मरना याने असम्भावित दुर्दांत रूप से मरना होता था . आजकल कि व्यवस्था में यह सामान्य प्रक्रिया हो गयी है इंसान के लिए .
दो दिनों के लिए युवराज इस देश के हमारे राज्य में हैं उन्हें इतने जल्दी ही पता चल गया कि राज्य सरकार अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुँच पा रही है और भ्रस्ताचार हो रहा है . उन्हें ये कौन बताएगा कि ३० साल से उनकी पार्टी ने ही ये पहुँच बंद कर रखी थी . और ये उनके पिता के समय भी नहीं पहुँच रही थी .

उधर दूसरी बड़ी पार्टी में चिंतन चल रहा है ? बड़ा अच्छा शब्द है लेकिन यथार्थ से कोसूं दूर

इस देश में अगर जनता जाग भी गयी तो आज कौन है नेत्रुत्व्या प्रदान करने के लिए ?

शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

योग्यता जाये भाड़ में , हर चीज नीलाम कर दो शायद इससे बेईमानी कम हो

आये दिन हर क्षेत्र में बढ़ते भर्ष्टाचार को देखते हुए तो लगता है इसका राष्ट्रीयकरण कर देना चाहिए . जैसे रेलवे ने दलालों की देखा देखि तत्काल कर लगा दिया अच्छा किया कुछ पैसा तो सरकार के पास आया . अगर जेब से पैसा निकलना ही है तो सरकार की जेब में क्यों न जाये .
भ्रष्टाचार और महंगाई का मूल कारण है एक अनार सौ बीमार . जब वस्तुएं और अवसर कम होंगे या बेबुनियाद के कानून और ढीली कानून व्यवस्था होगी तो ये फै़लेगा ही .
क्या इसका कोई इलाज नहीं है . कल ही एक चैनल में चर्चा हो रही थी कि संसद और सांसद जनता के अमूल्य धन का दुरुपोग कर रहे हैं समाचारों में प्रकाशित मामलों को जैसे एक सीरियल की चर्चा में देश और जनता का अमूल्य धन व्यर्थ कर रहे हैं इसी कार्यक्रम में बताया गया कि सरकारी रिपोर्ट में बताया गया कि सरकार के द्वारा खर्च किया गया १ रूपये में ३० पैसा ही उचित स्थान तक पहुँच रहा है . भाई अगर ऐसा है तो भ्रस्ताचार में भरी कमी आई है क्योंकि राजीव गाँधी के ज़माने में तो केवल १० पैसा पहुच रहा था .
हर तरह के उपाय किये जा रहे हैं लोगों को पैसा बैंक खाते के द्वारा दिया जाया इत्यादि इत्यादि लेकिन दी़मक और चूहे कही न कही से चारा चर ही जाते हैं . आज ही एक फैसला और आया है प्रसिद्ध चारा घोटाले के बारे में, एक भूतपूर्व सांसद और अन्य १३ को सजा दी गयी है . झारखण्ड में ५३ मामले इस बारे में ७ स्पेशल सीबीआई कोर्ट में चल रहे हैं जिनमे से ३० मामलों में २३० लोगों को सजा हो चुकी है जिनमे लालू प्रसाद यादव और जगन्नाथ मिश्र भी शामिल हैं. आज ही खबर आई कि कांग्रेस ने अपने कोटे से लालू यादव को संसद में प्रथम पंक्ति में स्थान उपलब्ध कराया है ! कल ही राहुल गाँधी का बयां आया था युवक कांग्रेसिओं के लिए कि वे अपने वाहनों में और नंबर प्लेट में अपने पदों का प्रदर्शन न करें . आज जन प्रतिनिधि इतने पंगु हो गए हैं कि उन्हें फोकट की सुरक्षा के बिना घर से निकलने में भी डर लग रहा है क्या इसीलिए आजादी पाई थी कि कुछ विदेशी शासकों को हटाकर देसी बैठा दिए जाएँ . इसके लिए भी वे संसद में वक़्त बर्बाद कर रहे हैं .

तो हम समस्या का निदान ढूंढते ढूंढते कहाँ आ गये ! अनावश्यक और पैसा वसूली वाले कानूनों को खत्म करना, कानून व्यवस्था का भारतीयकरण करना . सरकारी नियंत्रण को कम से कम करना . लोगों का रुझान सरकारी नौकरी पाने से दूर करना . उनमे आत्मस्वाभिमान जगाना . अगर ये सब नहीं हो सकता तो हर चीज चाहे वो नौकरी हो कोई अन्य अवसर जैसे मेडिकल कॉलेज की सीट को खुली नीलामी से बेच देना .