ये सबूत सुप्रीम कोर्ट में दिये गए हैं
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शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
ये हिन्दी हिन्दी क्या है
आजकल चहु ओर हिन्दी हिन्दी के नाम से बरसात हो रही है । क्या है यह हिन्दी दिवस और पखवाड़ा ?
क्या कोई भी भाषा, किसी दिन या पखवाड़े की मोहताज है । ये महज एक राजनैतिक षडयंत्रों के सिलसिले का एक अंग है । दुनिया में कहीं भी कोई अँग्रेजी, चीनी, जर्मन या फ्रांसीसी दिवस मनाया जाता है, मेरी जानकारी में तो नहीं है । समय के साथ परिवर्तन हर वस्तु में होता है और भाषा भी उससे बच नहीं पाती । भाषा वही प्रचलित और प्रसारित होती है जो जन जन को समझ में आए । साहित्य की भाषा अलग होती है और सामान्य जन की अलग। इस देश में बहुत सी भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं । नेताओं का अगला शिकार ये कभी भी हो सकती हैं , कुछ क्षेत्रों में तो यह प्रारम्भ भी हो गया है। नीव तो तभी खुद गयी थी जब अच्छी तरह से व्यवस्थित राज्यों को भाषायी आधार पर पुनर्गठित किया गया ।
छवि: सौजन्य गूगल
हिन्दी भाषियों को एक झुनझुना पकड़ा दिया गया है की हिन्दी राजभाषा है और सरकार उसके लिए बहुत प्रयासरत है की उसे राष्ट्रभाषा बना दिया जाए। क्या वाकई कोई भी राजनैतिक पार्टी, जो राष्ट्रिय स्तर की है इसे अपने चुनाव का मुद्दा बना सकती है ? इस देश की जनता बहुत ही झुनझुना प्रिय है । जनता पारंगत है झुनझुने पकड़ने में और नेता उन्हे पकड़ाने में।
क्या कोई भी भाषा, किसी दिन या पखवाड़े की मोहताज है । ये महज एक राजनैतिक षडयंत्रों के सिलसिले का एक अंग है । दुनिया में कहीं भी कोई अँग्रेजी, चीनी, जर्मन या फ्रांसीसी दिवस मनाया जाता है, मेरी जानकारी में तो नहीं है । समय के साथ परिवर्तन हर वस्तु में होता है और भाषा भी उससे बच नहीं पाती । भाषा वही प्रचलित और प्रसारित होती है जो जन जन को समझ में आए । साहित्य की भाषा अलग होती है और सामान्य जन की अलग। इस देश में बहुत सी भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं । नेताओं का अगला शिकार ये कभी भी हो सकती हैं , कुछ क्षेत्रों में तो यह प्रारम्भ भी हो गया है। नीव तो तभी खुद गयी थी जब अच्छी तरह से व्यवस्थित राज्यों को भाषायी आधार पर पुनर्गठित किया गया ।
छवि: सौजन्य गूगल
हिन्दी भाषियों को एक झुनझुना पकड़ा दिया गया है की हिन्दी राजभाषा है और सरकार उसके लिए बहुत प्रयासरत है की उसे राष्ट्रभाषा बना दिया जाए। क्या वाकई कोई भी राजनैतिक पार्टी, जो राष्ट्रिय स्तर की है इसे अपने चुनाव का मुद्दा बना सकती है ? इस देश की जनता बहुत ही झुनझुना प्रिय है । जनता पारंगत है झुनझुने पकड़ने में और नेता उन्हे पकड़ाने में।
बुधवार, 7 अप्रैल 2010
नेता की मृत्यु पर राजकीय या राष्ट्रीय शोक मनाया जाता है क्या शहीद इसके भी हकदार नहीं हैं
देश की रक्षा में रत छत्तीसगढ़ में केंद्रीय बल के जवानो की दुर्दांत हत्या और उनके संबंधियों और जनता के आँसू अभी सूखे भी नहीं हैं . सारा देश जहाँ शोकग्रस्त है, वहीं आज राष्ट्रपति भवन में पद्म पुरस्कारों का वितरण ?
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
विदेशों में जमा धन
अरे जरा रुकिए , ये क्या कह रहे हैं आप ? विदेशों में जमा धन वापस लायेंगे , क्यों ? फिर से उस भ्रष्ट व्यवस्था में डालने के लिए । कुछ तो अपने बुजुर्गों का लिहाज कीजिये , जो खून पसीने की कमाई उन्होंने इस देश के या अपने भविष्य के लिए जोड़ रखी है उसे तो छोड़ दीजिये , उन्होंने ही तो आपको सिखाया कैसे भ्रष्टाचार करना और अब आपकी नजर उस पर भी लग गई ! अच्छा कुछ पल के लिए मान भी लिया जाय की आपकी सोच अच्छी है और आप इस पैसे से इस देश में खुशहाली और तरक्की ले आएंगे , मगर आप ऐसा करंगे कैसे , कोई व्यवस्था है आपके पास ? अन्यथा फिर एक बार बाटने और बटवारे का चक्र चलेगा और जो जनता में एक आस पैदा हुई उसे भी बेमौत मरना पड़ेगा । विनम्र निवेदन है की जनता की आस न तोडें । अगर इतनी ही चिंता है तो स्विट्जरलैंड पर ही छोड़ दीजिये वो इस देश का विकास करे उस धन से .
शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
आतंकवाद और राजनीति
आजकल राजनेताओं में बहस छिडी है कि आतंकवाद का मुकाबला हम ज्यादा अच्छे से कर सकते हैं । इनको अभी तक क्या किसी ने रोक रखा था ? इतने गंभीर विषय को एक चुनावी मुद्दा बनाना क्या उचित है ? आज ये आतंकवाद देश को अन्दर और बाहर दोनों ओर से विकराल रूप से घेरे हुआ खड़ा है और ये अपनी रोटी सेकने में लगे हैं ।
आतंरिक आतंकवाद को तो पहले ये सरकार नकारती रही , पूर्व गृहमंत्री का तो ये बयान था कि नक्सलवाद कोई समस्या नही है , वर्त्तमान गृहमंत्री ने न जाने किस आधार पर वाम दलों को clean chit दे दी कि इनका कोई सम्बन्ध इनसे नही है , तो फिर ये क्यों इनका अपरोक्ष समर्थन करते हैं ?
छत्तीसगढ़ में माओवाद के आगमन और विस्तार के लिए कौन जिम्मेदार है ? इतिहास में जाएँ तो सब पता चल जायेगा । नक्सलवाद के प्रणेता कनु सान्याल ने तो इसका हश्र देखकर ख़ुद इससे किनारा कर लिया ।
चुनाव से कुछ समय पूर्व एक ट्रक भरा असला पकडाया छत्तीसगढ़ में , ये किस बात कि तय्यारी थी ?
मतदान के पहले और दौरान खून बहता रहा शायद इसकी ख़बर दिल्ली तक नही पहुँचती ।
BSF के अधिकारी ने तो स्पष्ट कहा है कि इसे रोक पाना राज्य सरकारों की क्षमता के बाहर है ।
हमारी सरकारें पाकिस्तान को कहते रहती हैं कि वो अपने देश में आतंकवादियों को समाप्त करें , पहले आप अपने देश में तो ऐसा कर दिखाएं , किसका इन्तेजार कर रहे हैं कि कब पानी सर के ऊपर से गुजर जाए ।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की जेल में एक व्यक्ति विचारधीन कैदी के रूप में बंद है , देशद्रोह के आरोप में , कहा जाता है है के ये एक बहुत बड़े समाजसेवी चिकित्सक है , जिन्हें इस राज्य में शायद ही कोई चिकित्सक जानता है । इनके समर्थन में देश विदेश के लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं । इससे इनकी पहुँच का अंदाजा हो सकता है । जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी जमानत देने से इंकार कर दिया उनके समर्थन में ख्याति प्राप्त लोग राज्य सरकार के खिलाफ खुला आन्दोलन चला रहे हैं । मुझे क्षमा करें किंतु या तो ये लोग किसी प्रभाव में ऐसा कर रहे हैं या इन्हे पता नही ये क्या कर रहे हैं।
मीडिया को भी कैसे दिग्भ्रमित किया जा सकता है इसका ये भी एक उदाहरण है । पूरे देश और विदेशों में नक्सली हिंसा के बारे में उतना नही छपता जितना इन्हे छुडाने के बारे में। कोई पूछे दो दर्जन नोबल पुरस्कार विजेता इन्हे कैसे जानते हैं ? जो अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार इन्हे दिया गया है , जिसे नोबल के बराबर बताया जा रहा है उसकी असलियत क्या है ? नामधारी मानवाधिकार संगठन इनको छुडाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं उनके लिंक क्या हैं . ये देश की आतंरिक सुरक्षा का विषय है ।
कुछ इन सज्जन के बारे में जो जानकारी मुझे मिली - इन्हों ने च्रिस्तियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर से अध्ययन किया है , ये वहाँ काफी नाम रखते हैं। वहाँ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में जोकि एक चिकीत्सा से सम्बंधित सम्मलेन था में इनकी तारीफ़ के पुल बंधे जाते हैं और छत्तीसगढ़ सरकार को गरियाया जाता है ।
आतंरिक आतंकवाद को तो पहले ये सरकार नकारती रही , पूर्व गृहमंत्री का तो ये बयान था कि नक्सलवाद कोई समस्या नही है , वर्त्तमान गृहमंत्री ने न जाने किस आधार पर वाम दलों को clean chit दे दी कि इनका कोई सम्बन्ध इनसे नही है , तो फिर ये क्यों इनका अपरोक्ष समर्थन करते हैं ?
छत्तीसगढ़ में माओवाद के आगमन और विस्तार के लिए कौन जिम्मेदार है ? इतिहास में जाएँ तो सब पता चल जायेगा । नक्सलवाद के प्रणेता कनु सान्याल ने तो इसका हश्र देखकर ख़ुद इससे किनारा कर लिया ।
चुनाव से कुछ समय पूर्व एक ट्रक भरा असला पकडाया छत्तीसगढ़ में , ये किस बात कि तय्यारी थी ?
मतदान के पहले और दौरान खून बहता रहा शायद इसकी ख़बर दिल्ली तक नही पहुँचती ।
BSF के अधिकारी ने तो स्पष्ट कहा है कि इसे रोक पाना राज्य सरकारों की क्षमता के बाहर है ।
हमारी सरकारें पाकिस्तान को कहते रहती हैं कि वो अपने देश में आतंकवादियों को समाप्त करें , पहले आप अपने देश में तो ऐसा कर दिखाएं , किसका इन्तेजार कर रहे हैं कि कब पानी सर के ऊपर से गुजर जाए ।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की जेल में एक व्यक्ति विचारधीन कैदी के रूप में बंद है , देशद्रोह के आरोप में , कहा जाता है है के ये एक बहुत बड़े समाजसेवी चिकित्सक है , जिन्हें इस राज्य में शायद ही कोई चिकित्सक जानता है । इनके समर्थन में देश विदेश के लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं । इससे इनकी पहुँच का अंदाजा हो सकता है । जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी जमानत देने से इंकार कर दिया उनके समर्थन में ख्याति प्राप्त लोग राज्य सरकार के खिलाफ खुला आन्दोलन चला रहे हैं । मुझे क्षमा करें किंतु या तो ये लोग किसी प्रभाव में ऐसा कर रहे हैं या इन्हे पता नही ये क्या कर रहे हैं।
मीडिया को भी कैसे दिग्भ्रमित किया जा सकता है इसका ये भी एक उदाहरण है । पूरे देश और विदेशों में नक्सली हिंसा के बारे में उतना नही छपता जितना इन्हे छुडाने के बारे में। कोई पूछे दो दर्जन नोबल पुरस्कार विजेता इन्हे कैसे जानते हैं ? जो अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार इन्हे दिया गया है , जिसे नोबल के बराबर बताया जा रहा है उसकी असलियत क्या है ? नामधारी मानवाधिकार संगठन इनको छुडाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं उनके लिंक क्या हैं . ये देश की आतंरिक सुरक्षा का विषय है ।
कुछ इन सज्जन के बारे में जो जानकारी मुझे मिली - इन्हों ने च्रिस्तियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर से अध्ययन किया है , ये वहाँ काफी नाम रखते हैं। वहाँ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में जोकि एक चिकीत्सा से सम्बंधित सम्मलेन था में इनकी तारीफ़ के पुल बंधे जाते हैं और छत्तीसगढ़ सरकार को गरियाया जाता है ।
गुरुवार, 2 अप्रैल 2009
आचार संहिता
चुनाव आयोग प्रजातंत्र के पांचवे स्तम्भ के रूप में इस देश में स्थापित हो गया है । अच्छा है जितने स्तम्भ होंगे उतना आधार मजबूत होगा । पर प्रजातंत्र और प्रजा का क्या होगा ? संहिता लागू होते ही सारे सरकारी दफ्तरों में काम बंद , अघोषित छुट्टी , बहाना चुनाव कार्य में व्यस्त यानी भ्रस्टाचार प्रीमियम रेट पर ।
आम आदमी को तो इसका कहीं कोई प्रभाव नेताओं या पार्टियों पर नही दिखाई देता, हर मामले को निपटने के लिए कब तक सुप्रीम कोर्ट जाते रहेंगे, अगर ऐसा ही है तो सब कोर्ट बंद करके सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट चलाया जाए ।
नेता बड़े चालाक होते हैं उन्होंने ऎटम बम को सुर्री बम बना के रख दिया है , बेचारी जनता करे भी तो क्या करे, अब तो खुले मंच से धमकी चमकी भी हो रही है । जनता को समझ कर एक मजबूत सरकार बनानी होगी वरना पिछले दो सत्रों जैसा हाल होगा, बड़ी पार्टियाँ छोटी पार्टियों को तेल लगा रही होंगी और छोटी पार्टियाँ मक्खन खा रही होंगी । हम एक भाग्यवादी देश के निवासी हैं सो हमें अपना भाग्य अपने हाथों नही बिगाड़ना चाहिए
आम आदमी को तो इसका कहीं कोई प्रभाव नेताओं या पार्टियों पर नही दिखाई देता, हर मामले को निपटने के लिए कब तक सुप्रीम कोर्ट जाते रहेंगे, अगर ऐसा ही है तो सब कोर्ट बंद करके सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट चलाया जाए ।
नेता बड़े चालाक होते हैं उन्होंने ऎटम बम को सुर्री बम बना के रख दिया है , बेचारी जनता करे भी तो क्या करे, अब तो खुले मंच से धमकी चमकी भी हो रही है । जनता को समझ कर एक मजबूत सरकार बनानी होगी वरना पिछले दो सत्रों जैसा हाल होगा, बड़ी पार्टियाँ छोटी पार्टियों को तेल लगा रही होंगी और छोटी पार्टियाँ मक्खन खा रही होंगी । हम एक भाग्यवादी देश के निवासी हैं सो हमें अपना भाग्य अपने हाथों नही बिगाड़ना चाहिए
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