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बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

वास्तव में हमारा चरित्र क्या है

इसे अन्यथा न लें

तिरिया चरित्रम पुरुषश्य भाग्यम
देवो न जानती .............

यह लोकोक्ति कहाँ से और कैसे उपजी इसके बारे में तो इतिहासकार ही बता सकते हैं ।

तुलसीदास भी कुछ भ्रम निर्मित कर गए ;
ढोंर गवार शूद्र पशु नारी ये सब तारण के अधिकारी । इसकी व्याख्या लोग अलग अलग करते हैं ।

अभी तक जो कहा गया वह इतिहास है

लेकिन वर्तमान में भी हम क्या कर रहे हैं

सबको मालूम है और ज़्यादातर लोग भ्रष्टाचार कर रहे हैं और बड़ी बड़ी संस्थाएं चुप बैठी हैं ।

इस व्यवस्था को जन्म देने के लिये क्या हम सब जिम्मेदार नहीं हैं ?

भय के बिना प्रीति नहीं होती - जब तक ऐसा कानून नहीं होगा जो भ्रष्टाचार को सबसे बड़े अपराध की श्रेणी में रखे , सब ऐसा ही चलता रहेगा ।

बूंद बूंद से घड़ा भरता है , घड़े को भरने से रोकने के लिए बूंद को रोकना  होगा ।

सबको पता है कहाँ से यह शुरू होता है और कहाँ खत्म ।

अब यह देश की जनता पर ही निर्भर करता है की वह अपने बारे में क्या चाहती है ।

स्कूली साक्षरता भले ही नहीं आई हो सरकारी हिसाबों में

इस देश की जनता अब सब समझती है ।

जय हिन्द 

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

ये हिन्दी हिन्दी क्या है

आजकल चहु ओर हिन्दी हिन्दी के नाम से बरसात हो रही है । क्या है यह हिन्दी दिवस और पखवाड़ा ?
क्या कोई भी भाषा, किसी दिन या पखवाड़े की मोहताज है । ये महज एक राजनैतिक षडयंत्रों के सिलसिले का एक अंग है । दुनिया में कहीं भी कोई अँग्रेजी, चीनी, जर्मन या फ्रांसीसी दिवस मनाया जाता है, मेरी जानकारी में तो नहीं है । समय के साथ परिवर्तन हर वस्तु में होता है और भाषा भी उससे बच नहीं पाती । भाषा वही प्रचलित और प्रसारित होती है जो जन जन को समझ में आए । साहित्य की भाषा अलग होती है और सामान्य जन की अलग। इस देश में बहुत सी भाषाएँ और बोलियाँ बोली जाती हैं । नेताओं का अगला शिकार ये कभी भी हो सकती हैं , कुछ क्षेत्रों में तो यह प्रारम्भ भी हो गया है। नीव तो तभी खुद गयी थी जब  अच्छी तरह से व्यवस्थित राज्यों को भाषायी आधार पर पुनर्गठित किया गया ।

छवि: सौजन्य गूगल

हिन्दी भाषियों को एक झुनझुना पकड़ा दिया गया है की हिन्दी राजभाषा है और सरकार उसके लिए बहुत प्रयासरत है की उसे राष्ट्रभाषा बना दिया जाए। क्या वाकई कोई भी राजनैतिक पार्टी, जो राष्ट्रिय स्तर की है इसे अपने चुनाव का मुद्दा बना सकती है ? इस देश की जनता बहुत ही झुनझुना प्रिय है । जनता पारंगत है झुनझुने  पकड़ने  में और नेता उन्हे पकड़ाने  में।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

वाह पाकिस्तान !! जागो कश्मीरियों जागो

पाकिस्तान ने फिर एक इतिहास कायम कर दिया । मानवाधिकार के हनन की इससे बड़ी घटना शायद ही कोई हो ।
पाकिस्तान में गंभीर बाढ़ आई और उसने एक बड़े इलाके को तहस नहस करके रख दिया । इसके चलते इस वर्ष वहाँ स्वतन्त्रता दिवस के कार्यक्रम भी स्थगित कर दिये गए । भारत ने एक पड़ोसी और सवेदनशील जागरूकता का परिचय देते हुए हर संभव सहायता और 50 milion $ की तुरंत मदद की पेशकश की । पाकिस्तान ने यह पेशकश ठुकरा दी !! यूएनओ और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं सारे विश्व से मदद की गुहार कर रही हैं ।
एक राष्ट्र जो एक प्राकृतिक त्रासदी में भी अपने नागरिकों का भला नजरंदाज करता है उसके बारे में क्या कहा जाए ?

जागो कश्मीरियों जागो

गुरुवार, 10 जून 2010

क्या होगा अगर मैं इस देश के सविधान को मानने से इंकार कर दूँ

मैंने जन्म लिया इस धरती पर . जिसे लोगों ने बाँट रखा था . क्या मेरा कोई अधिकार है प्रजातन्त्र में ?

लोग कहेंगे क्या फालतू की बात है . अब इसपर कोई कानूनदा ही बता सकता है की कानूनी क्या व्यवस्था है.

किसी भी मनुष्य को इस देश में संवैधानिक अधिकार 18 वर्ष की उम्र में प्राप्त होते हैं . इसके पहले उसके क्या अधिकार हैं और कौन उसका और उसके कर्मों का  जिम्मेदार है ?

जब उसे यह अधिकार मिलता है तो उसे कोई इसकी जानकारी सरकार द्वारा उपलब्ध करायी जाती है . उसे कोई ज्ञान दिया जाता है की क्या हैं उसके अधिकार और क्या है उसकी जिम्मेदारियाँ . उसे कोई मौका दिया जाता है इसे स्वीकार या अस्वीकार करने का या केवल इस भूखंड में जन्म लेने के कारण वह एक बंधक है इस भूभाग के साम्राज्यकारियों का . कहाँ है freedom of choice. बहुत बहस होती है इस देश में चुनाव , सरकार और व्यवस्था के बारे में . इन सबके बीच आम आदमी का व्यक्तिगत अधिकार बली चढ़ जाता है .यही है सबसे बड़ा कारण भ्रष्टाचार का .एक संगठित सरकारी व्यवस्था जहाँ एक भुलावा दिया जा रहा है जनता को कि यहाँ प्रजातन्त्र है लेकिन वास्तव में प्रजा तंत्र में है .
इतने सदियों की गुलामी भी शायद genes में परिवर्तन ला देती है .

इस देश को गरीबी के चंगुल से छुडाने वालों का कहीं जिक्र ही नहीं सारी वाहवाही सरकार ने लूट ली . क्या किया सरकार ने ? काम किया इस देश के युवाओं ने रात रात जग कर BPO और कम्प्युटर में काम करके मलाई नेता खा रहे हैं .

एक तो संविधान बना राजशाही के आधार पर और उसे भी कमजोर पाकर आधुनिक राजा उसमें भी अपनी सुविधा जोड़ते गए .


बड़ी छोटी सी दुनिया है हिन्दी ब्लाग जगत की . इससे उम्मीद की जाए क्या इंकलाब की .

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

क्या सरकार को नक्सलवादियों की ब्लैकमेलिंग का शिकार होना चाहिए

नृशंश मानवघाती नक्सलवादियों के एक नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी ने सरकार के सामने प्रस्ताव रखा है कि अगर सरकार अपना "ग्रीन हंट " अभियान रोकती है तो वो भी सुरक्षा दलों और सरकारी अधिकारियों पर हमला नहीं करेंगे .

जब अपनी जान पर आ पड़ी तो समझौता करने के लिए प्रयास ? अभी तक जो जाने इनने ली है उसकी सजा कौन भुगतेगा या इन्हे छोड़ दिया जाएगा ?

इस समाचार मे आदिवासियों का कोई जिक्र नहीं है , जिनकी भी ये हत्या करते रहे हैं .इस बात से यह स्पष्ट हो गया है कि इनका कोई जनाधार नहीं है . जनाधार पर आधारित किसी  आंदोलन को दुनिया की कोई भी सरकार नहीं दबा सकती है  चाहे कितना भी धन बल लगा ले .इनकी असली नजर उस अपर वन एवं खनिज सम्पदा पर थी जो प्रभावित क्षेत्रों मे विद्यमान है . इसका काफी दोहन भी ये प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कर चुके हैं , आदिवसियों और वनांचल के ठेकेदारों से वसूली करके . आयकर विभाग अगर सूक्ष्म जाँच करे तो इन नेताओं की अपार  संपत्ति का पता लगाया जा सकता है . इनके सारे बड़े नेता दो राज्यों से आते हैं यह किसी से छुपा नहीं है
.
कहाँ हैं इनके समर्थक तथाकथित मानवधिकारवादी, कहाँ है उनका क्षद्म आदिवासी प्रेम . इसकी भी गहन जाँच होनी चाहिए कि इनका क्या संबंध है नक्सलवादियों से .

अगर सरकार किसी भी दबाव मे आकर इनसे कोई भी समझौता करती है तो एक और गलत परंपरा का निर्माण करेगी जैसी भूल उसने पहले भी कश्मीर और पंजाब मे की है . जिन आतंकवादियों को छोड़ दिया गया वे आज भी  मुख्य धारा मे शामिल होने के बजाय अलगाववाद का झंडा उठाये घूम रहे हैं .

अब जबकी इनके एक बड़े नेता जिन्होने अपना उपनाम गांधी रखा है लेकिन कार्य बिल्कुल विपरीत हैं सरकार की पकड़ मे हैं , उससे अंदर का सब सच उगलवाने का प्रयास करना चाहिए . किस भी तरह का समझौता एक गलत संदेश लेकर जाएगा कि सामूहिक अत्याचार करो सरकार को दबाव मे डालो और छूट जाओ .

क्या जवाब देगी सरकार उन लोगों के परिवारों को जिनने अपनी जान गवाईं है इनके हाथों ? जिसमें सरकारी से लेकर आम आदिवासी शामिल हैं .

रविवार, 17 जनवरी 2010

मायावती द्वारा जनता के पैसे पर जन्म दिन मनाया गया



रायपुर के कई अखबारों में यह पूरे पेज का विज्ञापन दिखाई दिया . पहले तो यह विचार आया की कहीं मैं उत्तर प्रदेश में तो नहीं हूँ .
जनता के पैसे का ऐसा दुरुपयोग , क्या कोई न्याय पालिका इसका संज्ञान लेगी 








गुरुवार, 30 जुलाई 2009

अगर ऐसा ही होना है तो हो चुका आम आदमी के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था का विकास

इस देश में हर कोई रोना रोता है बिगड़ी हुई स्वास्थ्य व्यवस्था का लेकिन इसका कोई स्थानीय समाधान ढूँढने के बजाय हमारे भाग्य विधाता विदेशों की ओर टकटकी लगाकर देखते रहते हैं. पहले दुर्भाग्य तो यह की इतना बड़ा बौधिक धन होने के बावजूद उसे अवसर नहीं मिलना . ओढी हुई नीतियां जो अंग्रेजों ने बनाई थी हमारे माडर्न अंग्रेज उसमे कोइसुधार या व्यवस्था नहीं कर पाए . हर नेता यही कहता है डॉक्टर गाँव नहीं जाना चाहते , प्रश्न यह है कि आपके पास कितने डॉक्टर हैं और इतने सालों में आपने कितने लोगों को यह ज्ञान पाने की सुविधा प्रदान की . ये खुद तो ५ साल में एक बार गाँव जाते हैं और सरकारी फरमान सुना देते हैं कि डॉक्टर को गाँव जाना चाहिए. सुनने में बड़ा अच्छा लगता है कि नेताजी बड़ी काम की बात कर रहे हैं लेकिन जिस गाँव में स्कूल भी नहीं है वहाँ जाकर डॉक्टर करेगा भी क्या ?
इस देश के लायक कोई सफल स्वास्थ्य व्यवस्था नहीं बन पाने का कारण लोगों की अदूरदर्शिता ही कही जायेगी . इस देश को आवश्कता है मूलभूत डॉक्टर की नाकि उच्चतम शिक्षा की बाढ़ लगाने की . उच्च शिक्षा की भी जरूरत है लेकिन आज अडोस पड़ोस का मित्र पारिवारिक चिकत्सक गायब हो गया और उसकी जगह ले ली झोला छाप लोगों ने . पहले केवल पीएचडी और एलॉपथी चिकित्सक को ही डॉक्टर के नाम से जाना जाता था . आज तो बाढ़ सी आ गयी है ये जानना मुस्किल है कि अगला कौन सी पद्धति का चिकित्सक है या है भी नहीं ..
अपने पडोसी चीन और बंगला देश से भी आप सीख सकते थे जो कम खर्च में एक बुनियादी पद्धति का विकास करने में सफल हुए . लेकिन आपके चारो तरफ तो बड़ी बड़ी वैश्विक कंपनियां घूम रही थी .
आज अमेरिका जैसे देश को जो विश्व में आधुनिक चिकित्सा में सबसे आगे माना जाता है अपने पूरे सिस्टम को बदलने का प्रयास करना पड़ रहा है . विरोध वहां भी हो रहा है क्योंकि बड़ी बड़ी शक्तियां पीछे हैं. वहां सरकार अपने बजट का ३० प्रतिशत खर्च करने के बाद भी करोडो को स्वास्थ्य सुविधा नहीं दिला पा रही है ? यहाँ हम ३ प्रतिशत भी नहीं खर्च करके आसमान छू लेना चाहते हैं .
जिस तरह हम सारी नक़ल पश्चिम की कर रहे थे तो एक नक़ल और कर डाली पहले तो अपना बाजार उपभोक्ता वस्तुओं के लिए खोल दिया और साथ ही ले आये उपभोक्ता कानून . आप कह सकते हैं ये तो होना ही चाहिए . लेकिन इसका सबसे बुरा प्रभाव जो पश्चिम पहले से ही झेल रहा था अब ये गरीब देश झेल रहा है . इस कानून के भय से पहले तो चिकित्सक एक भयपूर्ण तनाव के माहोल में काम कर रहा है दुसरे सभी वस्तुएं महंगी और जनसाधारण की पहुँच से बाहर हो गयी हैं . आज किसी भी व्यक्ति की चकित्सा का ४० से ८० प्रतिशत खर्च दवाओं और अन्य सम्बंधित सामानों में होता है . जिनकी गुणवत्ता देखने का कोई अच्छा सिस्टम नहीं है , इसलिए धाद्ल्ले से नकली दवाओं और सामानों का बाजार गर्म है . MRP लगाकर लोगों को लूटने की खुली छूट कंपनियों को दे दी गयी है . कंपनियां भी आपसी प्रतिस्पर्धा में
डॉक्टरों को हर तरह से लुभा रही हैं .
कानून भी कभी मरहम लगा रहा है तो कभी चमड़ी नोच ले रहा है . सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ तो कई निर्णय दिए हैं जिनसे कि डॉक्टर अपना काम बिना किसी झूठे भय के दबाव में आकर कर सके, दूसरी ओर उसने एक सरकारी अस्पताल पर १ करोड़ रुपये का जुरमाना लगाया है एक ऑपरेशन के बाद हुए कॉम्प्लिकेशन के कारण . अगर किसीने कोई गलती जाबूझकर की है तो उसे उसकी सजा मिलनी चाहिए . प्रश्न केवल यह है इस देश और व्यस्था को देखते हुए इस सजा का कोई पैमाना तो होना चाहिए . किसीकी भी जान अमूल्य होती है उसका पैसे से मोल नहीं लगाया जा सकता लेकिन अगर इतने बड़ी सजा दी जाने लगी तो इस देश में स्वास्थ्य व्यवस्था का भगवन जाने क्या होगा.
.
कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट के मामले में जहाँ एक नामी वकील का अपराध सिद्ध हो गया है कि उसने गवाह को झूठी गवाही देने के लिए प्रेरित किया (जिसमे अभुक्त ने कार चढा कर कई लोगों की जान ले ली ), सजा २००० रुपये जुरमाना और ४ महीने काम से बाहर ?

मंगलवार, 2 जून 2009

कर्नाटक में राजनीति में सुधार के लिए एक अभिनव प्रयास

बेंगलुरु स्थित एक गैर सरकारी संगठन दक्ष ने एक नया कार्य हाथ में लिया है । चुनाव में चुन कर आए जन प्रतिनिधियों के कार्य की मॉनीटरिंग और उसके बाद उनके परफॉर्मेंस के बारे में एक सालाना रिपोर्ट प्रस्तुत की जायेगी । यह कार्य इस संस्था ने पिछले विधान सभा चुनाव के बाद से प्रारम्भ किया है और इसमे नए सांसदों को भी जोड़ा गया है । अभी कर्नाटक तक सीमित इस प्रयास को आगे पूरे देश में ले जाने की योजना है । इसमे जनता की भी प्रतिक्रिया ली जायेगी । इस संस्था में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग जुड़े है । इस रिपोर्ट से ये पता चलेगा की प्रतिनधि ने अपने छेत्र में कितना कार्य किया है । इसमे एक परफॉर्मेंस इंडेक्स भी दिया जायेगा जिससे विभिन्न प्रतिनिधियों के बीच तुलना भी हो सकेगी ।
अगर यह मुहीम सफल होती है तो अवश्य ही देश की राजनीति को एक नई दिशा मिलेगी .

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूँ

राहुल गाँधी ने आज बंगाल में जो कहा उसे सुनकर kamnishthon को मिर्ची लग गई । यहाँ छपाई की भूल नही है ये खाते तो भारत का लेकिन बजाते कहीं और का हैं। चार साल तक सरकार के साथ रहते रहते इन्हे याद नही था कि राजीव गाँधी ने क्या कहा था - "कोल्कता एक मृत शहर है"। आज जैसे ही राहुल ने कहा कि बंगाल में तो उत्तर प्रदेश से भी कम विकास हुआ है तो इनके तोते उड़ गए । फिर ख्याल आया, बंगाल की अतिसंवेदी जनता के लिए उनकी डूबती नैया का खेवनहार मिल गया । अब ये जनता को ये संदेश देकर बर्गलायेंगे , और इसके सिवा उनको आता क्या है । जिंदगीभर यही तो किया है .

गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

आचार संहिता

चुनाव आयोग प्रजातंत्र के पांचवे स्तम्भ के रूप में इस देश में स्थापित हो गया है । अच्छा है जितने स्तम्भ होंगे उतना आधार मजबूत होगा । पर प्रजातंत्र और प्रजा का क्या होगा ? संहिता लागू होते ही सारे सरकारी दफ्तरों में काम बंद , अघोषित छुट्टी , बहाना चुनाव कार्य में व्यस्त यानी भ्रस्टाचार प्रीमियम रेट पर ।

आम आदमी को तो इसका कहीं कोई प्रभाव नेताओं या पार्टियों पर नही दिखाई देता, हर मामले को निपटने के लिए कब तक सुप्रीम कोर्ट जाते रहेंगे, अगर ऐसा ही है तो सब कोर्ट बंद करके सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट चलाया जाए ।

नेता बड़े चालाक होते हैं उन्होंने ऎटम बम को सुर्री बम बना के रख दिया है , बेचारी जनता करे भी तो क्या करे, अब तो खुले मंच से धमकी चमकी भी हो रही है । जनता को समझ कर एक मजबूत सरकार बनानी होगी वरना पिछले दो सत्रों जैसा हाल होगा, बड़ी पार्टियाँ छोटी पार्टियों को तेल लगा रही होंगी और छोटी पार्टियाँ मक्खन खा रही होंगी । हम एक भाग्यवादी देश के निवासी हैं सो हमें अपना भाग्य अपने हाथों नही बिगाड़ना चाहिए