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बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

वास्तव में हमारा चरित्र क्या है

इसे अन्यथा न लें

तिरिया चरित्रम पुरुषश्य भाग्यम
देवो न जानती .............

यह लोकोक्ति कहाँ से और कैसे उपजी इसके बारे में तो इतिहासकार ही बता सकते हैं ।

तुलसीदास भी कुछ भ्रम निर्मित कर गए ;
ढोंर गवार शूद्र पशु नारी ये सब तारण के अधिकारी । इसकी व्याख्या लोग अलग अलग करते हैं ।

अभी तक जो कहा गया वह इतिहास है

लेकिन वर्तमान में भी हम क्या कर रहे हैं

सबको मालूम है और ज़्यादातर लोग भ्रष्टाचार कर रहे हैं और बड़ी बड़ी संस्थाएं चुप बैठी हैं ।

इस व्यवस्था को जन्म देने के लिये क्या हम सब जिम्मेदार नहीं हैं ?

भय के बिना प्रीति नहीं होती - जब तक ऐसा कानून नहीं होगा जो भ्रष्टाचार को सबसे बड़े अपराध की श्रेणी में रखे , सब ऐसा ही चलता रहेगा ।

बूंद बूंद से घड़ा भरता है , घड़े को भरने से रोकने के लिए बूंद को रोकना  होगा ।

सबको पता है कहाँ से यह शुरू होता है और कहाँ खत्म ।

अब यह देश की जनता पर ही निर्भर करता है की वह अपने बारे में क्या चाहती है ।

स्कूली साक्षरता भले ही नहीं आई हो सरकारी हिसाबों में

इस देश की जनता अब सब समझती है ।

जय हिन्द 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

विदेशों में जमा धन

अरे जरा रुकिए , ये क्या कह रहे हैं आप ? विदेशों में जमा धन वापस लायेंगे , क्यों ? फिर से उस भ्रष्ट व्यवस्था में डालने के लिए । कुछ तो अपने बुजुर्गों का लिहाज कीजिये , जो खून पसीने की कमाई उन्होंने इस देश के या अपने भविष्य के लिए जोड़ रखी है उसे तो छोड़ दीजिये , उन्होंने ही तो आपको सिखाया कैसे भ्रष्टाचार करना और अब आपकी नजर उस पर भी लग गई ! अच्छा कुछ पल के लिए मान भी लिया जाय की आपकी सोच अच्छी है और आप इस पैसे से इस देश में खुशहाली और तरक्की ले आएंगे , मगर आप ऐसा करंगे कैसे , कोई व्यवस्था है आपके पास ? अन्यथा फिर एक बार बाटने और बटवारे का चक्र चलेगा और जो जनता में एक आस पैदा हुई उसे भी बेमौत मरना पड़ेगा । विनम्र निवेदन है की जनता की आस न तोडें । अगर इतनी ही चिंता है तो स्विट्जरलैंड पर ही छोड़ दीजिये वो इस देश का विकास करे उस धन से .