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सोमवार, 7 मार्च 2011
रविवार, 13 फ़रवरी 2011
सरकार, नक्सलवाद और बिचौलिये
अगर आप किसी बात का विरोध नहीं करते तो इसका अप्रत्यक्ष मतलब यही है की उस बात या विश्वास का आप समर्थन कर रहे हैं । यही अंतर है देशभक्ति और देशद्रोह में ।
इस देश की सबसे बड़ी विडंबना यही लगती है की इस नए माध्यम(ब्लॉग या बज) का उपयोग देश और जनकल्याण के लिए करने के बजाय और कुछ रूप में किया जा रहा है ।
हर जगह राजनीति नहीं होनी चाहिये लेकिन हो यही रहा है । इंसान की जान के सौदे हो रहे हैं और लोग या तो इन दुर्दांत घटनाओ का समर्थन कर रहे हैं या चुप हैं ।
इस देश में क्या कभी कोई क्रांति हो सकती है या हर बात में सौदेबाजी होगी
शुक्रवार, 19 नवंबर 2010
यह देश कैसे और किसके द्वारा चलाया जा रहा है ओपेन मैगजीन का खुलासा
ये सबूत सुप्रीम कोर्ट में दिये गए हैं
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
क्या सरकार को नक्सलवादियों की ब्लैकमेलिंग का शिकार होना चाहिए
नृशंश मानवघाती नक्सलवादियों के एक नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी ने सरकार के सामने प्रस्ताव रखा है कि अगर सरकार अपना "ग्रीन हंट " अभियान रोकती है तो वो भी सुरक्षा दलों और सरकारी अधिकारियों पर हमला नहीं करेंगे .
जब अपनी जान पर आ पड़ी तो समझौता करने के लिए प्रयास ? अभी तक जो जाने इनने ली है उसकी सजा कौन भुगतेगा या इन्हे छोड़ दिया जाएगा ?
इस समाचार मे आदिवासियों का कोई जिक्र नहीं है , जिनकी भी ये हत्या करते रहे हैं .इस बात से यह स्पष्ट हो गया है कि इनका कोई जनाधार नहीं है . जनाधार पर आधारित किसी आंदोलन को दुनिया की कोई भी सरकार नहीं दबा सकती है चाहे कितना भी धन बल लगा ले .इनकी असली नजर उस अपर वन एवं खनिज सम्पदा पर थी जो प्रभावित क्षेत्रों मे विद्यमान है . इसका काफी दोहन भी ये प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कर चुके हैं , आदिवसियों और वनांचल के ठेकेदारों से वसूली करके . आयकर विभाग अगर सूक्ष्म जाँच करे तो इन नेताओं की अपार संपत्ति का पता लगाया जा सकता है . इनके सारे बड़े नेता दो राज्यों से आते हैं यह किसी से छुपा नहीं है
.
कहाँ हैं इनके समर्थक तथाकथित मानवधिकारवादी, कहाँ है उनका क्षद्म आदिवासी प्रेम . इसकी भी गहन जाँच होनी चाहिए कि इनका क्या संबंध है नक्सलवादियों से .
अगर सरकार किसी भी दबाव मे आकर इनसे कोई भी समझौता करती है तो एक और गलत परंपरा का निर्माण करेगी जैसी भूल उसने पहले भी कश्मीर और पंजाब मे की है . जिन आतंकवादियों को छोड़ दिया गया वे आज भी मुख्य धारा मे शामिल होने के बजाय अलगाववाद का झंडा उठाये घूम रहे हैं .
अब जबकी इनके एक बड़े नेता जिन्होने अपना उपनाम गांधी रखा है लेकिन कार्य बिल्कुल विपरीत हैं सरकार की पकड़ मे हैं , उससे अंदर का सब सच उगलवाने का प्रयास करना चाहिए . किस भी तरह का समझौता एक गलत संदेश लेकर जाएगा कि सामूहिक अत्याचार करो सरकार को दबाव मे डालो और छूट जाओ .
क्या जवाब देगी सरकार उन लोगों के परिवारों को जिनने अपनी जान गवाईं है इनके हाथों ? जिसमें सरकारी से लेकर आम आदिवासी शामिल हैं .
जब अपनी जान पर आ पड़ी तो समझौता करने के लिए प्रयास ? अभी तक जो जाने इनने ली है उसकी सजा कौन भुगतेगा या इन्हे छोड़ दिया जाएगा ?
इस समाचार मे आदिवासियों का कोई जिक्र नहीं है , जिनकी भी ये हत्या करते रहे हैं .इस बात से यह स्पष्ट हो गया है कि इनका कोई जनाधार नहीं है . जनाधार पर आधारित किसी आंदोलन को दुनिया की कोई भी सरकार नहीं दबा सकती है चाहे कितना भी धन बल लगा ले .इनकी असली नजर उस अपर वन एवं खनिज सम्पदा पर थी जो प्रभावित क्षेत्रों मे विद्यमान है . इसका काफी दोहन भी ये प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कर चुके हैं , आदिवसियों और वनांचल के ठेकेदारों से वसूली करके . आयकर विभाग अगर सूक्ष्म जाँच करे तो इन नेताओं की अपार संपत्ति का पता लगाया जा सकता है . इनके सारे बड़े नेता दो राज्यों से आते हैं यह किसी से छुपा नहीं है
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कहाँ हैं इनके समर्थक तथाकथित मानवधिकारवादी, कहाँ है उनका क्षद्म आदिवासी प्रेम . इसकी भी गहन जाँच होनी चाहिए कि इनका क्या संबंध है नक्सलवादियों से .
अगर सरकार किसी भी दबाव मे आकर इनसे कोई भी समझौता करती है तो एक और गलत परंपरा का निर्माण करेगी जैसी भूल उसने पहले भी कश्मीर और पंजाब मे की है . जिन आतंकवादियों को छोड़ दिया गया वे आज भी मुख्य धारा मे शामिल होने के बजाय अलगाववाद का झंडा उठाये घूम रहे हैं .
अब जबकी इनके एक बड़े नेता जिन्होने अपना उपनाम गांधी रखा है लेकिन कार्य बिल्कुल विपरीत हैं सरकार की पकड़ मे हैं , उससे अंदर का सब सच उगलवाने का प्रयास करना चाहिए . किस भी तरह का समझौता एक गलत संदेश लेकर जाएगा कि सामूहिक अत्याचार करो सरकार को दबाव मे डालो और छूट जाओ .
क्या जवाब देगी सरकार उन लोगों के परिवारों को जिनने अपनी जान गवाईं है इनके हाथों ? जिसमें सरकारी से लेकर आम आदिवासी शामिल हैं .
रविवार, 2 अगस्त 2009
अरे भाई माल्या जी ये अमेरिका नहीं है जहाँ अरबपति को खैरात मिलती है
निजी विमान कंपनिया ने एक कोशिश की अपनी दुख दर्द सुनकर अमेरिका की तर्ज में भीख मांगने की . लेकिन जवाब उल्टा मिला . धमकी मिल गयी मंत्री से के अगर हड़ताल में गए तो कार्यवाही होगी . शायद विमान कंपनियां सोच रही थी कि भारत में भी वैश्विक व्यवस्था कायम है और अमेरिकी कंपनियों की तरह उन्हें भी सरकार कुछ दान दे देगी लेकिन उलटी पड़ी . भाया ये भारत है अभी भी राजशी ब्रिटिश तंत्र लागू है
मंगलवार, 2 जून 2009
कर्नाटक में राजनीति में सुधार के लिए एक अभिनव प्रयास
बेंगलुरु स्थित एक गैर सरकारी संगठन दक्ष ने एक नया कार्य हाथ में लिया है । चुनाव में चुन कर आए जन प्रतिनिधियों के कार्य की मॉनीटरिंग और उसके बाद उनके परफॉर्मेंस के बारे में एक सालाना रिपोर्ट प्रस्तुत की जायेगी । यह कार्य इस संस्था ने पिछले विधान सभा चुनाव के बाद से प्रारम्भ किया है और इसमे नए सांसदों को भी जोड़ा गया है । अभी कर्नाटक तक सीमित इस प्रयास को आगे पूरे देश में ले जाने की योजना है । इसमे जनता की भी प्रतिक्रिया ली जायेगी । इस संस्था में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग जुड़े है । इस रिपोर्ट से ये पता चलेगा की प्रतिनधि ने अपने छेत्र में कितना कार्य किया है । इसमे एक परफॉर्मेंस इंडेक्स भी दिया जायेगा जिससे विभिन्न प्रतिनिधियों के बीच तुलना भी हो सकेगी ।
अगर यह मुहीम सफल होती है तो अवश्य ही देश की राजनीति को एक नई दिशा मिलेगी .
अगर यह मुहीम सफल होती है तो अवश्य ही देश की राजनीति को एक नई दिशा मिलेगी .
सोमवार, 20 अप्रैल 2009
राहुल गाँधी और वाजपेयी जी
राहुल ने टिपण्णी की है कि वाजपेयी जी को अपने गृहमंत्री पर विश्वास नहीं था । राहुल से कोई पूछेगा अगर कांग्रेस की सरकार रहती तो कंधार मामले में क्या करती । चीन से युद्ध के समय बंदूकें न चलने के कारण जो सैनिक मारे गए और हमारी हार हुई उसका जवाबदार कौन है । पाकिस्तान ने कश्मीर का एक हिस्सा हड़प लिया १९४७-४८ में कौन जिम्मेदार। भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन कर जो जहर बीज बोया गया , कौन जिम्मेदार।
गुरुवार, 2 अप्रैल 2009
आचार संहिता
चुनाव आयोग प्रजातंत्र के पांचवे स्तम्भ के रूप में इस देश में स्थापित हो गया है । अच्छा है जितने स्तम्भ होंगे उतना आधार मजबूत होगा । पर प्रजातंत्र और प्रजा का क्या होगा ? संहिता लागू होते ही सारे सरकारी दफ्तरों में काम बंद , अघोषित छुट्टी , बहाना चुनाव कार्य में व्यस्त यानी भ्रस्टाचार प्रीमियम रेट पर ।
आम आदमी को तो इसका कहीं कोई प्रभाव नेताओं या पार्टियों पर नही दिखाई देता, हर मामले को निपटने के लिए कब तक सुप्रीम कोर्ट जाते रहेंगे, अगर ऐसा ही है तो सब कोर्ट बंद करके सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट चलाया जाए ।
नेता बड़े चालाक होते हैं उन्होंने ऎटम बम को सुर्री बम बना के रख दिया है , बेचारी जनता करे भी तो क्या करे, अब तो खुले मंच से धमकी चमकी भी हो रही है । जनता को समझ कर एक मजबूत सरकार बनानी होगी वरना पिछले दो सत्रों जैसा हाल होगा, बड़ी पार्टियाँ छोटी पार्टियों को तेल लगा रही होंगी और छोटी पार्टियाँ मक्खन खा रही होंगी । हम एक भाग्यवादी देश के निवासी हैं सो हमें अपना भाग्य अपने हाथों नही बिगाड़ना चाहिए
आम आदमी को तो इसका कहीं कोई प्रभाव नेताओं या पार्टियों पर नही दिखाई देता, हर मामले को निपटने के लिए कब तक सुप्रीम कोर्ट जाते रहेंगे, अगर ऐसा ही है तो सब कोर्ट बंद करके सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट चलाया जाए ।
नेता बड़े चालाक होते हैं उन्होंने ऎटम बम को सुर्री बम बना के रख दिया है , बेचारी जनता करे भी तो क्या करे, अब तो खुले मंच से धमकी चमकी भी हो रही है । जनता को समझ कर एक मजबूत सरकार बनानी होगी वरना पिछले दो सत्रों जैसा हाल होगा, बड़ी पार्टियाँ छोटी पार्टियों को तेल लगा रही होंगी और छोटी पार्टियाँ मक्खन खा रही होंगी । हम एक भाग्यवादी देश के निवासी हैं सो हमें अपना भाग्य अपने हाथों नही बिगाड़ना चाहिए
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