नक्सलवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नक्सलवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 19 मई 2010

चिदंबरम जी देश के गृह मंत्री के पास अधिकार नहीं है तो क्या दिग्विजयसिंग के पास है

देश के गृह मंत्री ने ये बयान दिया की उनके पास सीमित अधिकार हैं . बयानों से तो यही लग रहा है अधिकार दिग्विजयसिंग  के पास हैं . उन्होने कहा था बीजेपी के सेटिंग है नक्सलियों के साथ बीजेपी की बिडिग ज्यादा है .
इसका क्या मतलब है इसका खुलासा करेंगे देशवाशियों के सामने .
कौन है इस देश में सरकार चलाने वाला ?
दिग्विजयसिंग का छत्तीसगढ़ से क्रोध तो समझ में आने वाली बात है क्योंकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए एक काँग्रेस नेता के घर मार खानी पड़ी थी उनको लेकिन नक्सल समस्या आज किसी राज्य  की नहीं देश की समस्या बन चुकी है .

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

काँग्रेस ये फैसला कर ले कि वह नक्सलवाद के साथ है?

आज दिग्विजयसिंग जो मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में अखिल भारतीय कॉंग्रेस के महासचिव हैं ने एक बयान में चिदम्बरम के नक्सल विरोधी अभियान को गलत बताया है http://naxalwatch.blogspot.com/2010/04/digvijay-questions-chidambarams-naxal.html  .
 इससे तो यही माना जाना चाहिए कि यह कॉंग्रेस पार्टी का मत है, क्योंकि न तो सोनिया गांधी न राहुल गांधी ने कोई भी विचार इस बारे में व्यक्त किया है . न ही इनहोने कोई संवेदना भी दंतेवाड़ा में मारे कर्मियों के बारे में प्रकट की है .
कल ही गृह मंत्रालय ने एक पत्र सभी मंत्रियों और अधिकारियों को जारी कर के कहा था कि इस बारे में केवल गृह मंत्रालय ही आधिकारिक बात कहेगा . दिग्विजयसिंह तो इस सीमा में नहीं आते लेकिन उनकी बात उनके ख़िलाफ़ समाचार पत्र में लगाये आरोप को और पक्का करती है जिसे यहाँ दर्शाया गया है . शायद यह बयान चिदम्बरम के बयान के जवाब में आया है .
काँग्रेस पार्टी को देश की जनता के सामने अपना पक्ष रखना जरूरी है क्योंकि ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि उसके कुछ सहयोगी दल नक्सल समर्थक हैं .इस घटना में मारे गए लोग केंद्रीय सुरक्षा बल के थे इसलिये केंद्र इससे पल्ला भी नहीं झाड़  सकती .

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

क्या सरकार को नक्सलवादियों की ब्लैकमेलिंग का शिकार होना चाहिए

नृशंश मानवघाती नक्सलवादियों के एक नेता कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी ने सरकार के सामने प्रस्ताव रखा है कि अगर सरकार अपना "ग्रीन हंट " अभियान रोकती है तो वो भी सुरक्षा दलों और सरकारी अधिकारियों पर हमला नहीं करेंगे .

जब अपनी जान पर आ पड़ी तो समझौता करने के लिए प्रयास ? अभी तक जो जाने इनने ली है उसकी सजा कौन भुगतेगा या इन्हे छोड़ दिया जाएगा ?

इस समाचार मे आदिवासियों का कोई जिक्र नहीं है , जिनकी भी ये हत्या करते रहे हैं .इस बात से यह स्पष्ट हो गया है कि इनका कोई जनाधार नहीं है . जनाधार पर आधारित किसी  आंदोलन को दुनिया की कोई भी सरकार नहीं दबा सकती है  चाहे कितना भी धन बल लगा ले .इनकी असली नजर उस अपर वन एवं खनिज सम्पदा पर थी जो प्रभावित क्षेत्रों मे विद्यमान है . इसका काफी दोहन भी ये प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कर चुके हैं , आदिवसियों और वनांचल के ठेकेदारों से वसूली करके . आयकर विभाग अगर सूक्ष्म जाँच करे तो इन नेताओं की अपार  संपत्ति का पता लगाया जा सकता है . इनके सारे बड़े नेता दो राज्यों से आते हैं यह किसी से छुपा नहीं है
.
कहाँ हैं इनके समर्थक तथाकथित मानवधिकारवादी, कहाँ है उनका क्षद्म आदिवासी प्रेम . इसकी भी गहन जाँच होनी चाहिए कि इनका क्या संबंध है नक्सलवादियों से .

अगर सरकार किसी भी दबाव मे आकर इनसे कोई भी समझौता करती है तो एक और गलत परंपरा का निर्माण करेगी जैसी भूल उसने पहले भी कश्मीर और पंजाब मे की है . जिन आतंकवादियों को छोड़ दिया गया वे आज भी  मुख्य धारा मे शामिल होने के बजाय अलगाववाद का झंडा उठाये घूम रहे हैं .

अब जबकी इनके एक बड़े नेता जिन्होने अपना उपनाम गांधी रखा है लेकिन कार्य बिल्कुल विपरीत हैं सरकार की पकड़ मे हैं , उससे अंदर का सब सच उगलवाने का प्रयास करना चाहिए . किस भी तरह का समझौता एक गलत संदेश लेकर जाएगा कि सामूहिक अत्याचार करो सरकार को दबाव मे डालो और छूट जाओ .

क्या जवाब देगी सरकार उन लोगों के परिवारों को जिनने अपनी जान गवाईं है इनके हाथों ? जिसमें सरकारी से लेकर आम आदिवासी शामिल हैं .

सोमवार, 25 जनवरी 2010

क्या एनडीटीवी नक्सलवाद का समर्थक है

क्या एनडीटीवी नक्सलवाद का समर्थक है . लगता तो ऐसा ही है . एनडीटीवी यह बात साफ़ करे की उनका इन महाशय से क्या संबंध है . आज जब पूरा देश एक बड़े षड्यंत्र से जूझने के लिए एक जुट हो रहा है तो ऐसे समय इस तरह की विचारधारा को प्रोत्साहन देना क्या साबित करता है . क्या आज एलेक्ट्रोनिक मीडिया अपने आप को स्वयंभू समझ बैठा है और उसे इस तरह की अराजकता और देशद्रोह फैलाने की छूट किसने दे रखी है .
चिदम्बरम जी ध्यान दें उनकी नाक के नीचे और कितने षड्यंत्र राजधानी में ही रचे जा रहे हैं
http://khabar.ndtv.com/2009/10/21002329/column-priyadarshan-maoists.html

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

ऐसे तो हो चुका नक्सलवाद का इलाज

राज्यपाल द्वारा बुलाई गई बैठक को एक प्रभावशाली नेता ने निरस्त करवा दिया. ऐसे तो होने से रहा कोई काम. छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी नक्सल समाया के बारे में . पहले तो कांग्रेस में ही सर फुट्टवल होने लगी बैठक के बहिस्कार को लेकर और अंत में ये हासिल हुआ। कांग्रेस क्या इस राज्य के लोगों को बेवकूफ समझती है । अभी हाल फिलहाल में दो चुनाव हार कर भी चैन नही आया तो अपने आकाओं से राष्ट्रपति शासन की मांग कर डाली । भइया पहले अपने घर का नेता तो चुन लो फिर गद्दी की तैयारी करना । आज पहली बार चिदंबरम ने स्वीकार किया की देश की सबसे बड़ी समस्या नक्सलवाद है । अपने राज्य के नेताओं को भी जरा समझा दें ये बात जो सिर्फ़ राज की बात सोचते हैं जनता की नही । अबूझमाड़ के द्वार बंद कर के आदिवासियों को उनके हाल पर ३० साल तक छोड़ने वाले कौन ? ६ साल के अलावा इस राज्य में आज तक शासन किसने किया ( पुराने मध्य प्रदेश को मिलाकर ) ? वाम दलों से समझौता किसने किया जो नक्सलवादियों के समर्थक हैं ? चुनाव से पहले नागा केंद्रीय दल को हटाने का कारण क्या था ? कहने को तो राज्य की आतंरिक सुरक्षा का जिम्मा राज्य सरकार का होता है लेकिन वो एक भी सिपाही केन्द्र की अनुमति के बिना नही रख सकती । हथियारों की तो बात ही नही करें प्रथम विश्व युद्ध के हथियार लेकर ऑटोमेटिक से लड़ना तो आम आत्महत्या करना ही है । पड़ोस का दुश्मन तो दिखाई देता है घर का दुश्मन लंका ढाये । राहुल भइया आप ही कोई क्लास लो अपने नेताओं की .

शुक्रवार, 12 जून 2009

अबूझमाड़ के द्वार खुले

अबूझमाड़ बस्तर का वह क्षेत्र है जिसे आम आदमी के लिए ३० साल पहले बंद कर दिया गया था। कारण कई बताये गए लेकिन मुख्य मुद्दा इस क्षेत्र में रहने वालों की सभ्यता को दुनिया की बुरी नजरों से बचाना था । यह वही जगह है जो अपनी घोटुल परम्परा के लिए विश्व विख्यात है । इस परम्परा को ग़लत रूप से ज्यादा प्रचारित किया गया । प्रश्न ये है क्या इस व्यवस्था ने जिसने इन्हे बाकी दुनिया से काट दिया इनका क्या भला किया । बाकी लोग तो दूर रहे नक्सलियों ने इसे अपना गढ़ बना लिया । आज यह इलाका इनका मुख्य केन्द्र है बस्तर में ।
आज भी कुछ लोग इसे खोलने के निर्णय का विरोध कर रहे हैं , जाहिर है उनका क्या उद्देश्य है ।
प्रश्न ये है की क्या आदिवासियों को उनके जीवन दर्शन से दूर किया जाना चाहिए विकास के नाम पर या उन्हें भी पश्चिमी सभ्यता से जोड़ देना चाहिए । उन्हें बाहरी दुनिया से काटकर, बिना किसी सुरक्षा इन्तेजाम के कितना सही था ? इनके लिए तो एक तरफ़ कुआँ और दूसरी तरफ खाई वाली बात हो गई । आदिवासियों और अन्य पिछडे वर्गों के लिए मगरमच्छ के आंसू बहाने वाली पार्टियों के पास कोई जवाब है इसका .

शुक्रवार, 15 मई 2009

मानवधिकार और नक्सलवाद

आज के अखबार में कल रायपुर में बिनायक सेन के समर्थन में एक रैली निकाली गई की ख़बर छापी अब शायद लोग ये न कह सकेंगे कि छत्तीसगढ़ के पत्रकार बिनायक सेन के विरूद्व हैं । इसमे कई नामचीन लोग शामिल हुए । इनमे से एक जे एन यू के प्रोफ़ेसर डॉक्टर मुख़र्जी भी थे । उनका कहना है "बिना हिंसा के आन्दोलन बेअसर "। अब मानवाधिकार के प्रवर्तकों के ये विचार है तो दुनिया का क्या होगा ? ये सारे लोग एक व्यक्ति के लिए जितना तन मन धन लगा रहे हैं उसमे न जाने कितने गरीबों का भला होता । लेकिन उन्हें इससे क्या मतलब । उन्हें तो अपनी एक सोची समझी मुहीम को आगे बढ़ाना है । मुख़र्जी साहब शायद बहुत सीधे व्यक्ति हैं जिनके मुह से ये सच निकल ही गया कि क्या सोच है उनके संगठन की। और कितना खून बहाना चाहते हैं आप लोग ? मुख्यमंत्री रमन सिंह के इस बयान को भी तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत किया गया जो उन्होंने कुछ दिन पहले दिया था " उन्हें खुशी होगी अगर बिनायक सेन को अदालत जमानत देती है "। उन्होंने कानूनी और मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत किया लेकिन इसे यू टर्न करार दिया गया !
इस आन्दोलन के बारे में जब मैंने कुछ जानकारी ली तो पता चला , बिनायक सेन के नाम से वेब साईट में केवल समर्थक टिप्पणियां ही ली जाती हैं । एमनेस्टी ने अपने साईट में समर्थन जाहिर किया है लेकिन उन्होंने कुछ प्रश्नों का जवाब नही दिया । प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका लांसेट से जब ये पूछा गया कि उन्होंने किस आधार पर इस सन्दर्भ में लेख छापा तो उन्होंने एमनेस्टी का सन्दर्भ दिया , साथ ही उन्होंने ये भी पूछा कि क्या बिनायक सेन विचाराधीन कैदी हैं ? इन सब बातों से क्या जाहिर होता है ?
हमारी सरकार कब तक इन सबसे आँखे मूंदे रहेगी या किसी दल का इनको आतंरिक समर्थन है ?
हम इस देश को किस और ले जाना चाहते है, विकल्प हमारे आस पास ही हैं - पाकिस्तान, बांग्लादेश , नेपाल, चीन, म्यांमार या श्रीलंका । हमें अपना ये मिथक तोड़ना होगा कि हम बहुत बड़े देश हैं और कोई हमारा कुछ नही बिगाड़ सकता । घर का भेदी लंका ढाये, ये कहावत किसीने अपने पूर्ण अनुभव के बाद ही कही होगी ।
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिश्तां क्या होगा ................

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

एक अपील

जो कुछ भी कुछ समय से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में नक्सलवाद और बिनायक सेन के बारे में ग़लत बयानबाजी हो रही है , उसका छत्तीसगढ़ के पत्रकार अपने संपर्कों को सही स्थिति बताकर ये दुष्प्रचार बंद करवाएं।
हद ही हो गई अरुंधती रॉय के नेशनल मीडिया को दिए बयान में "There is a civil war in this state" यानी छत्तीसगढ़ में अराजकता फैली हुई है ? शायद अरुंधती जी को यहाँ के पत्रकारों द्वारा पूछे प्रश्न भारी लगे । ये बयान मेधा जी ने प्रेस को भेजा है , मेधाजी ने मीडिया मैनेजमेंट का नया काम संभाल लिया है , बधाई हो।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2009

श्रीलंका आतंकवाद और हम

श्रीलंका की सेना बधाई की पात्र है की उसने बहुत सारे बंधकों को छुडा लिया और अपनी अन्तिम विजय की और अग्रसर है । हर देश को ये अधिकार है की वो अपनी संप्रभुता की रक्षा कर सके और शान्ति और व्यवस्था बनाये रख सके। सरकार का धर्म ही है की वो अपने नागरिकों की रक्षा कर सके ।
हमारे देश की सरकार कब जागेगी ? कब जब ये तथाकथित नक्सलवादी संसद की देहलीज तक पहुँच जायेंगे । कुछ दिन पहले थलसेना अध्यक्ष अपनी यात्रा बिना पूरी किए छत्तीसगढ़ से चले गए । एक अखबार में एक टी वी चैनल के संदर्भ से उनका बयान आया है कि नक्सलवाद सामाजिक आर्थिक समस्या है उसके लिए सेना की आवश्यकता नही है ! न जाने किसने जनरल की ब्रीफिंग की है ? चुनाव के पहले चरण में ही १७ सुरक्षा कर्मी शहीद हो गए हैं । छत्तीसगढ़ में नियुक्त BSF के अधिकारी का कुछ दिनों पहले ही बयान आया था कि ये समस्या पुलिस के बस की नहीं है । क्योंकि इससे लड़ने के लिए न उनके पास ट्रेनिंग है न ही हथियार । देश की सुरक्षा की चिंता करने वाले नेता कब जागेंगे और ये पता लगायेंगे कि इन्हे रसद पानी कहां से मिल रहा है जिससे इनके पास रॉकेट और ग्रेनेड लौंचेर जैसे हथियार पहुँच गए जो टीवी पर तालिबानी लिए घूमते हैं ?

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009

आतंकवाद और राजनीति

आजकल राजनेताओं में बहस छिडी है कि आतंकवाद का मुकाबला हम ज्यादा अच्छे से कर सकते हैं । इनको अभी तक क्या किसी ने रोक रखा था ? इतने गंभीर विषय को एक चुनावी मुद्दा बनाना क्या उचित है ? आज ये आतंकवाद देश को अन्दर और बाहर दोनों ओर से विकराल रूप से घेरे हुआ खड़ा है और ये अपनी रोटी सेकने में लगे हैं ।
आतंरिक आतंकवाद को तो पहले ये सरकार नकारती रही , पूर्व गृहमंत्री का तो ये बयान था कि नक्सलवाद कोई समस्या नही है , वर्त्तमान गृहमंत्री ने न जाने किस आधार पर वाम दलों को clean chit दे दी कि इनका कोई सम्बन्ध इनसे नही है , तो फिर ये क्यों इनका अपरोक्ष समर्थन करते हैं ?
छत्तीसगढ़ में माओवाद के आगमन और विस्तार के लिए कौन जिम्मेदार है ? इतिहास में जाएँ तो सब पता चल जायेगा । नक्सलवाद के प्रणेता कनु सान्याल ने तो इसका हश्र देखकर ख़ुद इससे किनारा कर लिया ।
चुनाव से कुछ समय पूर्व एक ट्रक भरा असला पकडाया छत्तीसगढ़ में , ये किस बात कि तय्यारी थी ?
मतदान के पहले और दौरान खून बहता रहा शायद इसकी ख़बर दिल्ली तक नही पहुँचती ।
BSF के अधिकारी ने तो स्पष्ट कहा है कि इसे रोक पाना राज्य सरकारों की क्षमता के बाहर है ।
हमारी सरकारें पाकिस्तान को कहते रहती हैं कि वो अपने देश में आतंकवादियों को समाप्त करें , पहले आप अपने देश में तो ऐसा कर दिखाएं , किसका इन्तेजार कर रहे हैं कि कब पानी सर के ऊपर से गुजर जाए ।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की जेल में एक व्यक्ति विचारधीन कैदी के रूप में बंद है , देशद्रोह के आरोप में , कहा जाता है है के ये एक बहुत बड़े समाजसेवी चिकित्सक है , जिन्हें इस राज्य में शायद ही कोई चिकित्सक जानता है । इनके समर्थन में देश विदेश के लोग विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं । इससे इनकी पहुँच का अंदाजा हो सकता है । जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने भी जमानत देने से इंकार कर दिया उनके समर्थन में ख्याति प्राप्त लोग राज्य सरकार के खिलाफ खुला आन्दोलन चला रहे हैं । मुझे क्षमा करें किंतु या तो ये लोग किसी प्रभाव में ऐसा कर रहे हैं या इन्हे पता नही ये क्या कर रहे हैं।
मीडिया को भी कैसे दिग्भ्रमित किया जा सकता है इसका ये भी एक उदाहरण है । पूरे देश और विदेशों में नक्सली हिंसा के बारे में उतना नही छपता जितना इन्हे छुडाने के बारे में। कोई पूछे दो दर्जन नोबल पुरस्कार विजेता इन्हे कैसे जानते हैं ? जो अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार इन्हे दिया गया है , जिसे नोबल के बराबर बताया जा रहा है उसकी असलियत क्या है ? नामधारी मानवाधिकार संगठन इनको छुडाने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं उनके लिंक क्या हैं . ये देश की आतंरिक सुरक्षा का विषय है ।
कुछ इन सज्जन के बारे में जो जानकारी मुझे मिली - इन्हों ने च्रिस्तियन मेडिकल कॉलेज वेल्लोर से अध्ययन किया है , ये वहाँ काफी नाम रखते हैं। वहाँ एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन में जोकि एक चिकीत्सा से सम्बंधित सम्मलेन था में इनकी तारीफ़ के पुल बंधे जाते हैं और छत्तीसगढ़ सरकार को गरियाया जाता है ।