सोमवार, 25 जनवरी 2010

क्या एनडीटीवी नक्सलवाद का समर्थक है

क्या एनडीटीवी नक्सलवाद का समर्थक है . लगता तो ऐसा ही है . एनडीटीवी यह बात साफ़ करे की उनका इन महाशय से क्या संबंध है . आज जब पूरा देश एक बड़े षड्यंत्र से जूझने के लिए एक जुट हो रहा है तो ऐसे समय इस तरह की विचारधारा को प्रोत्साहन देना क्या साबित करता है . क्या आज एलेक्ट्रोनिक मीडिया अपने आप को स्वयंभू समझ बैठा है और उसे इस तरह की अराजकता और देशद्रोह फैलाने की छूट किसने दे रखी है .
चिदम्बरम जी ध्यान दें उनकी नाक के नीचे और कितने षड्यंत्र राजधानी में ही रचे जा रहे हैं
http://khabar.ndtv.com/2009/10/21002329/column-priyadarshan-maoists.html

13 टिप्‍पणियां:

SACCHAI ने कहा…

" maine bhi padh liya hai vo aartical ..afsos ki baat hai ..bandook ki boli boli per aise buddhijivi ...."

" naksalvad ka siddha paksh hi le liya hai ..kabhi vo dsh ke ander ho rahi arajakata ki baat kartain hai to kabhi aam aadmi ki boli bhi bolte hai ....JAISE unhone kaha hai

"अगर ऐसे किसी अराजक दिन के अंदेशे से बचना है तो गृह मंत्री को पहले अपना घर देखना होगा और फिर नक्सली इलाकों में पत्थर उछालने होंगे। वे नक्सलियों के विरुद्ध कार्रवाई तो करने निकले हैं लेकिन ये कार्रवाई आसान नहीं होगी। क्योंकि जिन जंगलों और बस्तियों में यह कार्रवाई होनी है वहां आम नागरिक और नक्सली के बीच का फर्क करना भी आसान नहीं होगा। इसके बावजूद कार्रवाई हुई तो वैसी ही होगी जैसी श्रीलंकाई सेना ने एलटीटीई को ख़त्म करने के लिए श्रीलंका में की। क्या हम अपने ही नागरिकों के विरुद्ध ऐसे नरसंहार के लिए तैयार हैं अगर नहीं तो हमें दूसरे उपाय सोचने होंगे।

ye usi post ke kuch ansh hai ...

" aapne sahi mudda uthaya hai mahesh sir ..hume is gambhir mudde ke baare me sochana hi chahiye ..ki electronic media ko itani choot kyo di rakhhi hai ? jo sahi galat jan nahi sakta "

----- eksacchai { AAWAZ }

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

प्रियदर्शन जी आपका आलेख पढ कर गंभीर निराशा हुई हालांकि बहुत आश्चर्य नहीं हुआ चूंकि नक्सलियों के समर्थन में लिखना इस देश में बुद्धिजीवी का लेबल लगवाने की अनिवार्य शर्त बनता जा रहा है।

माओवादी निश्चित रूप से स्थानीय असंतोष से उपजी प्रतिक्रिया भर नहीं हैं बल्कि स्थानीय असंतोष को नासूर बनाने का उपक्रम हैं। मैं बस्तर से हूँ और मैंने वह दौर देखा है जब नक्सली नहीं थे और वह भी जब नक्सली मजबूत हुए और आज का समय भी जब यह समस्या विकराल हो गयी है। वस्तुत: लकीर पीटने वाले इस मुल्क में आप जैसे पत्रकारों का भी दोष नहीं है। बस्तर में अनेकों विकास परियोजनायें घोषित हुई लेकिन हर बार कोई न कोई विरोध और कोई न कोई बकवास उनके क्रियांन्वयन के खिलाफ रहा।

आदिवासी समाज विकसित भी होता रहा, अनेक आदिम कॉलिज और विश्वविद्यालयों तक भी पहुँचे किंतु हमारा तंत्र क्षेत्र के बाहर तो उन्हे रोजगार और विकास देने को तैयार नहीं था और भीतर तथा कथित बुद्धिजीवियों को इस बात की चिंता थी कि कहीं मानव संग्रहालय बस्तर का मानव आगे न बढ जाये। लोगों नें बोधघाट जैसी परियोजना आधी पूरी होने के बाद बंद करवा दी, यहाँ लगने वाले स्टील प्लांट विशाखापटनम चले गये और बहुत सी परियोजनायें बस्तर से बाहर लग गयीं और यहाँ का आदमी केवल इन्द्रावती निहारता रह गया। ये वो ही लोग थे जिन्होने नक्सलियों के लिये जमीन तैयार की और इन्ही लोगों को यहाँ बेरोजगारी भूख और गरीबी यहाँ इस कदर दिखती है कि लोकतंत्र ही कटघरे में खडा हो जाता है।

प्रियदर्शन साहब नक्सल इस लिये हैं चूंकि जब नक्सली समर्थक गिरफ्तार होते हैं या मारे जाते हैं तो आप लोग कैमरा और कलम लिये दौडे पडते हैं लेकिन बस्तर में आदिम लगातार तालिबानियों से बदतर आतंकवाद का शिकार होते रहे तब आप कहाँ सोते हो?

मुझे हमेशा शक रहा है कि बस्तर को मीडिया भारत का हिस्सा मानता भी है या नहीं। नक्सली आतंक की खबर हमेशा हाशिये पर रहती है। दो दो बार नक्सलियों नें पूरे बस्तर संभाग की ट्रांशमिशन लाईन उडा कर अंधेरा कर दिया। दिल्ली के एक मुहल्ले में अगर 8 घंटे बिजली न आये तो हाय तौबा मच जाती है लेकिन पूरे देश के मीडिया को यह घबर लगी ही नहीं। यही कारण है कि एसी जगहों पर आतंकवाद मजबूत हुआ।

माफ कीजियेगा प्रियदर्शन जी नक्सलवाद को आन्दोलन नहीं आतंकवाद कहने की हिम्मत जिस दिन इस देश के मीडिया को होगी तब स्वत: क्रांति हो जायेगी। जंगल खुद नक्सलियों का विरोध करने लगा है। बस्तर का सलवा जुडुम आन्दोलन इस बात की गवाही है। बस्तर में हाल ही में नक्सल समर्थक जन सभा से आदिवासियों नें मेधा पाटकर और उनके साथियों को चलता कर दिया था यह उनका जागरण है । उन्हे मुक्ति चाहिये कमसे कम कलमची उन्हे कमजोर न करें तो बेहतर। आपको लाल सलाम के लिये बहुत से फोरम पत्रिकाये और प्रकाशक उपलब्ध होंगे लेकिन इनकी पुकार किसी के कान तक नहीं जाती। दुर्भाग्य .....

SACCHAI ने कहा…

" apka mudda bilkul sahi hai sir maine bhi vo aalekh padha hai agar aapne us aalekh ke kuch ansh yahan per diye rahte to pathako ko maza aata ...."


aakhir vo sabit kya karna chahta hai ? ye naksaliki boli kyu ? kyu ?

kya jo rajneta ke baaraime likha vo sach hai magar andaz galat hai ?

aise kahi sawal uthatain hai is pot se ..magar
SAAF HAI KI UNHONE NAKSALIYOAN KA PAKSH LIYA HAI

" mahesh sir ,aapka her ek sawal jo post me pucha gaya hai vo main to bilkul sahi manta hu ...humain sochana hi chahiye ."

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

दिगम्बर नासवा ने कहा…

एन डी टी वी की विश्वसनीयता वैसे भी बहुत अच्छी नही है ....... पाकिस्तान के प्रति भी उनका प्रेम जगजाहिर है .....

Suresh Chiplunkar ने कहा…

NDTV हर उस बात के खिलाफ़ है जिसके जरिये भारत मजबूत होता है। और हर उस बात के पक्ष में है जिससे भारत कमजोर होता है… आपने नक्सलवाद का उदाहरण भर दिया है, लेकिन पहले भी कई बार इनका चेहरा बेनकाब हो चुका है, जैसे बरखा दत्त द्वारा करगिल युद्ध में कवरेज, फ़िर 26/11 का कवरेज, अरुंधती रॉय को अनावश्यक फ़ुटेज, एमएफ़ हुसैन को भारत रत्न दिलवाने के लिये SMS मंगवाना आदि…। प्रणव "जेम्स" रॉय ने उड़ीसा में एक मिशनरी ईसाई के जलाये जाने पर तथा कोलकाता में रिज़वान के मारे जाने पर "छातीकूट" अभियान चलाया था, वही जेम्स रॉय, सेमुअल रेड्डी की राह पर चलकर ऑस्ट्रेलिया में जलाये गये भारतीय अथवा कश्मीर में मारे गये रजनीश के लिये चुप्पी साधे हुए है… इससे बड़ा सबूत और क्या चाहिये…

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

यह आलेख चिदम्बरम की माओवादियों से बातचीत की नीति का विरोध माओवाद के सैद्धांतिक आधार को स्पष्ट करते हूए कर रहा है। इस के प्रकाशन से एनडीटीवी किस तरह देशद्रोही हो जाता है यह समझ नहीं आया।
आखिर यह बात यदि जनता के बीच जाती है कि माओवादियों का सैद्धांतिक मत क्या है उस से क्या हानि होने वाली है। इस सैद्धांतिक आधार मात्र से माओवादी हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता। इस का सैद्धांतिक जवाब ही उस का उत्तर हो सकता है, वह दिया जाना चाहिए। तभी माओवादियों का मुकाबला किया जा सकता है। उस का उत्तर नहीं दिया जाना वर्तमान व्यवस्था की कमजोरी ही समझा जाएगा।

निर्मला कपिला ने कहा…

ांअपकी चिन्ता वाज़िब है धन्यवाद्

राज भाटिय़ा ने कहा…

आप की बात से सहमत है

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

राजीव जी और सुरेश जी ने इस सम्बन्ध मे अपनी बात रखी है उससे हम भी सहमत है.

shama ने कहा…

Gantantr diwas kee anek shubhkamnayen!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

"क्या आज एलेक्ट्रोनिक मीडिया अपने आप को स्वयंभू समझ बैठा है "(?)
इसमें शक की कोई गुंजाइश है?
अगर भरोसा न हो तो किसी भी चैनल के एंकर/कर्ता-धर्ता से बात करके देख लीजिए.... आप पाएंगे कि उन्हें पक्का पता होता है कि वे संसार के सबसे समझदार व्यक्ति हैं :-)O

संजय बेंगाणी ने कहा…

अरे! अभी तक आप एनडीटीवी को पहचाने नहीं थे क्या?

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति....आप को गणतन्त्र दिवस की शुभकामनायें.....