बुधवार, 9 दिसंबर 2009

चुनाव बुखार से त्रस्त छत्तीसगढ़ वासी

आजकल फिर से छत्तीसगढ़ में चुनाव का बुखार जम कर फैला है. इस बार मौका है स्थानीय निकायों के चुनाव का, नगर निगम से लेकर ग्राम पंचायत का . घमासान तो होना ही था दोनों प्रमुख पार्टियों में . एक एक पद  के लिए साम, दाम, दंड, भेद सभी अस्त्र उपयोग में आ रहे हैं . एक पद होता है पार्षद को जोकि एक मोहल्ले का ही व्यक्ति होता है . इस बार देखा जा रहा है कि बढती हुई राजनैतिक प्रतिस्पर्धा में सारे नियम ताक में रखे जा रहे हैं . होना तो यह चाहिए के मोहल्ले ya गाँव के लोग आपस में बैठकर अपने प्रतिनिधि का चयन करें जिससे  आपसी सदभाव और उचित व्यक्ति का चयन हो सके . लेकिन हमने व्यवस्था ही ऐसी बना ली है जहाँ जनता गौण और नेता सर्वोपरि हो गया है . रायपुर के एक एक पार्षद का दर्जा उसे मिलने वाले फंड  के कारण विधायक के बराबर हो गया है
दूसरी  तरफ से भी जनता पिस रही है इन नेताओं के जुलूसों से जिनसे रोज शहर में जाम लग रहा है . कौन मानता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश ?

4 टिप्‍पणियां:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

चुनाव-चुनाव और पिछले साल भर से सिर्फ चुनाव ही तो हो रहा है छत्‍तीसगढ में इसके चलते सरकारी कामकाज सब ढप्‍प है, हर सरकारी कर्मचारी चुनाव कार्य में लगे होने के बहाने से मजे कर रहा है औ लोगों की फाईलें अटकी पडी है. और नेता मजे कर रहे हैं. जय छत्‍तीसगढ.

हमारे नगर निगम में तो डॉ. शिवकुमार भिड गए हैं भिंभोरा फोर के अब आगे आगे देखिये होता है क्‍या.

cmpershad ने कहा…

राजनीति से सभी त्रस्त हैं डॊक्टर साहब :(

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

सही कहा आपने। यही हमारे देश की त्रासदी है।
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शानदार रही लखनऊ की ब्लॉगर्स मीट
नारी मुक्ति, अंध विश्वास, धर्म और विज्ञान।

nisha ने कहा…

Interesting! I remain cynical but looking at the state of affairs in the neighbouring countries, I would say that the leadership of India has not entirely failed us ... it's a relative situation but still one that can keep us hopeful. I only hope that slowly warming up romance with the USA, is kept warm but at a hands distance. And women and men protect their right to demand accountability and oppose, not withstanding their various affiliations. Leaders can be only as self-serving as citizens together let them be.